
!! भूमिका !!
उत्तराखंड मिशन नेताजी द्वरा वर्ष २००५ के माह मई की संसद में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज करने तथा एक प्रष्ठ का A T R (action taken report) सरकार द्वारा प्रस्तुत करने के पश्चात दिनांक १९ जून २००५ के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कलकत्ता हवाई अड्डे पर कार्य कर्ताओं द्वारा रोष प्रकट करने पर,कि सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट पर सदन में बहस क्यों नहीं होने दी तो श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा कलकत्ता हवाई अड्डे पर ही यह तथ्य उजागर करने के बाद, कि हम तो मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट पर बहस कराना चाहते थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी द्वारा हल्ला मचाने के कारण बहस न कराके मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट सरकार द्वारा दफ्तर दाखिल करा दी गई!
उपरोक्त समाचार को दिनांक 19-06-2006 को पढ़कर मुझ सेवा निवृत निरीक्षक,उ. प. पुलिस, जो वर्ष 1977 में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, देहरादून शाखा में प्रति नियुक्ति पर था, के मन में एक प्रेरणा उत्पन्न हुई और राजेंद्र नाथ शर्मा, सुप्रींटेंडेंट, आई ए एस मसूरी, वर्तमान में पता, मकान न. D- 112/2 नेहरु कालोनी, देहरादून को साथ लेकर नेता जी के साथ सम्बंधित तथ्यों की खोज करने का प्रयास किया और विभिन्न व्यक्तियों एवं समाचार पत्रों के अद्ध्ययन कर ज्ञात हुआ कि स्वामी जी, 194 राजपुर रोड, देहरादून जो पटियाला हाउस के नाम से जाना जाता था, उस के एक कमरे में पीछे की तरफ उन्होंने ११० दिन की समाधि ली थी और अपने प्राण अपने कपाल से निकाले थे तथा उनके दर्शन करने मैं स्वयं व देहरादून तथा अन्य जगहों से कई हजार व्यक्ति राजपुर रोड, देहरादून में एकत्रित हुए थे.
१२ अप्रैल १९७७ को मैंने स्वामीजी की मृत्यु के उपरांत उनके शरीर के दर्शन किये थे परन्तु मुझसे पूर्व ही, सर्व-प्रथम अजमेर सिंह रंधावा ने वहां पहुंच कर सब रहस्य जान लिए थे जो कि उन्होंने मेरे साथ गाजियाबाद के न्यूज़ चैनल पर उजागर भी किये थे, फिर एक बार सहारा चैनल वालों ने भी अजमेर सिंह रंधावा का इंटरव्यू लेकर प्रसारित भी किया था !
१९ जून २००९, के टाइम्स आफ इंडिया के समाचार को पढ़ कर एवं दैनिक जागरण में दिए गये तथ्यों को पढ़कर कथित स्वामी जी वर्ष 1973 में शौल्मारी आश्रम से देहरादून चले आये थे तो मुझसे रहा नहीं गया और पुलिस की नौकरी के तजुर्बे ने मुझे उपरोक्त तथ्यों की जानकारी लेने की प्रेरणा दी और श्री राजेंद्र नाथ शर्मा को साथ लेकर तथ्यों की जांच में हम दोनों जुट गए! अपनी जांच में आए तथ्यों को हमने एक मिशन गठित करके विभिन्न माध्यमों से अधिकारियों व मीडिया एवं समाचार पत्रों के द्वारा इस सत्य को जनता एवं सरकार तक पहुँचाने का अथक प्रयास किया और अब भी मिशन उसी तत्परता तथा तल्लीनता से तथ्यों को उजागर करने के प्रयास में है! अमरावती के श्री पाध्ये दिनांक ६ जून २००९ को दो माह का वीजा लेकर जर्मनी रवाना हो चुके हैं! उनका सरदार अजमेर सिंह जी रंधावा से, टेलीफोन पर कहना था कि भारतवर्ष में उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक को जिसके कुछ अंश स्वामी शारदानंद, कथित नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा जंगल में निवास के दौरान सीधे बात करके लिखाये गये थे, उन्हें कोई पब्लीशर छापने को तैयार नहीं था ! अतः उन्होंने जर्मनी के किसी पब्लीशर से सम्पर्क कर दो माह का वीजा लेकर जर्मनी जाना ही उचित समझा, ताकि इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष २००९ के अंत तक हो जाए!
इस सत्य को छिपाने में कर्नल प्रीतम सिंह जी(सुभाष के प्रमुख सहयोगी)ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी,परन्तु उनके कई कार्यों से यह स्वयं ही सिद्ध हो गया था कि वे सत्य को छिपा रहे हैं!हमारी टीम ने उनसे कई बार मुलाकात की परन्तु उन्होंने सदा ही इन बातों को टाल दिया!इससे हम भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि ये किसी वचन बद्धता से बंधे हैं और सत्य को छिपा रहे हैं लेकिन अपनी जीवन लीला समाप्त करने से पूर्व उन्होंने कुछ सत्य बोले थे!एक तो उन्होंने सुभाष की उस फोटो को पहचान लिया था तथा अचानक ही उनके मुख से यह सत्य प्रकट हो गया था कि यह फोटो नेता जी का था जबकि यह फोटो तो १९६४ में नेहरु की मृत देह के पास लिया गया था, दूसरा सत्य था कि नेताजी साइबेरिया की जेल के कमरा न, ४६५ में कैद थे, जबकि यही सत्य तो गुहा जी और स्तालिन की पुत्री स्वेतलाना ने भी उजागर किया था जिस से नेहरु चिढ़ गए थे!
इससे दो बातें तो प्रमाणित हुईं कि नेता जी रूस में बंदी रहे और १९६४ में वे जीवित थे!
जिस टिन शेड कमरे में नेताजी, कथित स्वामी शारदानंद जी की समाधि बताई जाती है उस पर एक भू-माफिया इंदर सिंह द्वारा २००१ में अवैध कब्जा करके कमरे में स्थित समाधि तुड़वा कर, रजाई - गद्दे भर दिए गये थे जिसकी शिकायत सर्व- प्रथम कर्नल प्रीतम सिंह (सेवा-निवर्त्त आई ऍन ऐ)निवासी डोईवाला द्वारा नवम्बर २००१ में ही तत्कालीन गवर्नर उत्तराखंड, देहरादून को अपने पत्र द्वारा व स्वयं मिल कर की थी और तत्कालीन प्रधान मंत्री व राष्ट्रपति को टेलीग्राम द्वारा सूचित कर दिया था!कर्नल प्रीतम सिंह, स्वामी शारदानंद समिति के तत्कालीन अध्यक्ष,तथा सुभाष के परम सहयोगी थे,जिनका वर्ष २००९ में देहावसान हो गया!
दैनिक जागरण समाचार पत्र द्वारा दिनांक २८ फ़रवरी २००८ की फोटो प्रति संलग्न करते हुए एक बार फिर स्मरण हो आया है कि इन स्वामीजी/नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन एवं कृत्यों को याद न करते हुए, भुलाए जाने का प्रयास हमारी स्वतंत्र सरकार एवं नेतागण निरंतर कर रहे हैं, भारत के इस सपूत की अनदेखी करना हम सब के लिए शर्म की बात है !
इन पूरे तथ्यों को इस पुस्तक में विस्तार से अजमेर सिंह रंधावा द्वारा प्रस्तुत किया गया है तथा सभी अनछुए पहलुओं के बारे में विस्तार पूर्वक समझाने का प्रयत्न किया गया है फिर भी यदि कोई त्रुटी रह गई हो तो कृप या http://deathofsubhashbose.blogspot.com/ इस वेबसाइट पर कान्टेक्ट अस (Contact us) पर सम्पर्क करें !
सहारा समाचार पत्र द्वारा दिनांक २५ मई २००७ के अनुसार स्वामीजी को देहरादून में दिया गया, पूर्ण सैनिक एवं राजकीय सम्मान,अपने किस्म का एकमात्र एवं अभूतपूर्व मामला था, सरकार ने सम्मान तो दिया लेकिन मान्यता नहीं!ना ही अब तक सरकार ने इस रहस्य से पर्दा ही उठाया है कि यदि उपरोक्त स्वामीजी, आदरणीय नेताजी नहीं थे तो वे कौन थे, और उन्हें एक स्वामी/सन्यासी होते हुए भी यह पूर्ण सैनिक एवं राजकीय सम्मान क्यों दिया गया?
जबकि यह रहस्य सर्व विदित था और यह रहस्योद्घाटन तो १९६२ में ही किया जा चुका था!
भारत सरकार जान बूझकर इस रहस्य को बनाये रखना चाहती है और रही मान्यता की बात, तो अब तक तो भारत सरकार ने उन्हें क्रांतिकारी भी नहीं माना!
इसलिए उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारत वर्ष के इस अमर सेनानी को यह पुस्तक समर्पित की जा रही है जिस से सुभाष जी की सच्चाई को और सरकार के विश्वासघात को देश की जनता स्वयं पहचान ले तथा इस सच को भी जान ले कि स्वामी शारदानंद जी ही वास्तव में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे!
हमने बहुत प्रयत्न किये कि स्वामी रामदेव जी से मुलाकात हो सके और वे हमारे इस पुनीत कार्य में हमें सहयोग दें ताकि हम इस सत्य को दुनिया के सामने उजागर कर सकें परन्तु अफ़सोस कि उन्होंने कभी कोई उत्तर नहीं दिया और न ही कोई आश्वासन!अंत में हमने उनसे अपनी सभी आशाएं समाप्त कर दीं!आखिर वे जितनी मर्जी स्वतंत्रता सेनानियों की बातें करें या देश भक्ति की,परन्तु सन्यासी होते हुए भी वे एक व्यापारी हैं,उन्होंने भी तो अपना माल बेचना है,उनके भी तो अपने स्वार्थ हैं,इसलिए उन्होंने हमें कोई सहयोग नहीं दिया !
बातें करने वाले तो हमने बहुत देखे हैं पर कर्मयोगी कोई नहीं, देखा तो सिर्फ स्वामी शारदानंद जी / नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को जिन्होंने प्रसिद्धी को ठोकर मार दी और गुमनामी मैं ही अपना जीवन बिता दिया!
आज टेलीविजन चेनल्स, समाचार पत्रों, संसद या देश की किसी भी विधान सभा व परिषद में तथा किसी परिचर्चा में उस महानायक के जीवन चरित्र तथा देश को स्वतंत्रता दिलाये जाने के प्रयासों की कोई भी, किसी भी प्रकार की चर्चा नहीं की जाती!केवल विमान दुर्घटना का विवरण दे कर इस देशभक्त क्रांतिकारी का मामूली जिक्र कर दिया जाता है!केन्द्रीय सरकार द्वारा केवल अंत में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को भी एक पृष्ठ का ATR देकर दाखिल दफ्तर करार दे दिया गया और प्रणव मुखर्जी जैसे पूँछ हिलाने वाले नेताओं के यह कहने पर कि कांग्रेस पार्टी की सरकार तो संसद में बहस करना चाहती थी लेकिन बी जे पी वालों ने हो-हल्ला मचा दिया!
उत्तराखंड मिशन नेताजी के कर्मठ कार्य कर्ताओं की संख्या लगभग ४०० से ऊपर है जिनके जीवन का एक ही ध्येय है कि राजपुर रोड देहरादून का वह भाग, जहां नेताजी का देहावसान हुआ अर्थात १९४ राजपुर रोड, पर एक भव्य स्मारक नेताजी की स्मृति में बनाया जाए ! स्वतंत्रता के इस महानायक की यात्रा जो कटक से प्रारंभ हुई, उसका अंत देहरा दून में हुआ !
ओ. पी. शर्मा
अध्यक्ष
उत्तराखंड मिशन नेताजी,
डी-२५८/५ नेहरु कालोनी,
देहरा दून (उत्तराखंड)
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!! नेता जी सुभाष चन्द्र बोस !!
यह बड़ा ही विचारणीय विषय है कि जब से अंग्रेजों ने हिंदुस्तान में राज्य कायम करना शुरू किया,हिन्दुस्तान लगभग २००-२५० वर्षों तक उनका गुलाम रहा!सिर्फ पंजाब अकेला ऐसा राज्य है जो लगभग १०० वर्ष ही गुलाम रहा परन्तु इन १०० वर्षों में भी अंग्रेजों को चैन से रहना नसीब न हुआ!
१८४५ में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु,तत्पश्चात डोगरा सेना-पतियों द्वारा सिख राज्य से गद्दारी और उसके बाद लगभग ५० वर्षों बाद ही पंजाब के क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था!सबसे पहले ग़दर पार्टी बनी, जिसके लीडर बाबा गुरदित्ता सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे नौजवानों ने पंजाब से लेकर कलकत्ता और कनाडा तक भारतीय क्रान्ति की एक नई लहर को जन्म दिया!फिर तो पंजाब. यू. पी. और बंगाल से उठी क्रान्ति की लहरों ने ही भारत देश को आज़ादी दिलाई न कि गाँधी की अहिंसा ने !
यह एक कटु सत्य है !!
महात्मा गांधी को, भारत सरकार के प्रचार-प्रसार माध्यमो से,भारत के जन-मानस में,उनकी छवि को एक संत बना कर उभारा है! हकीकत में वे अंग्रेजों के पिट्ठू थे! उनके सभी कार्य अंग्रेजों की प्रसन्नता के लिए ही होते थे उन्हों ने जितने भी आन्दोलन प्रारम्भ किये-अपने चरम पर नहीं पहुंचे!जहा अंग्रेजों के खिलाफ जरा सी भी हिंसा होती, आन्दोलन समाप्त कर दिया जाता,परन्तु भारतीयों पर अंग्रेजों की हिंसा को राजधर्म कहा जाता था !
ऐसी अहिंसा - अहिंसा नहीं कायरता होती है !!
उदाहरण:- पेशावर में वीर चन्द्र सिंह द्वारा गढ़वाली सैनिक विद्रोह,जलियाँ वाला बाग़,भगत सिंह और चौरी -चौरा पर दिए उनके वक्तव्य तथा इनके आंदोलनों की परिणति जैसे भारत छोडो आन्दोलन,व्यक्तिगत सत्याग्रह आदि !
अंग्रेजी राज्य के खिलाफ पहली क्रान्ति १८५७ में हुई थी! यह एक सुनियोजित क्रान्ति नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें सभी धर्मों के लोगों और सभी राज्यों ने भाग नहीं लिया था अपितु यह कतिपय उन राजाओं का विद्रोह था,जिनका राज्य अंग्रेजों ने छल-पूर्वक छीन लिया था!दिल्ली व मेरठ में भी क्रान्तिकारियों का कोई नेता न था,अत: बूढे बादशाह बहादुर शाह जफ़र को ही राजा मान लिया गया था!
सिख इस मुस्लिम शासक को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे!वे दिल्ली दरबार के भूतपूर्व मुस्लिम शासकों द्बारा किये गये जुल्मों को भूले न थे! अंग्रेजों ने अंत में इस विद्रोह को कुचल दिया था! बहादुर शाह जफ़र को कैद करके वे रंगून ले गये थे जहा उनकी मृत्यु हुई!उन्हें रंगून में ही दफना दिया गया था!
जहां उनकी समाधि भी बनी है !
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने उनकी मजार से ही अंग्रेजों के विरूद्व विद्रोह (क्रान्ति) का आगाज़ किया था !
यह एक दूसरी क्रान्ति थी, एक सफल क्रान्ति, जो न केवल हिन्दुस्तान के भीतर से ही अंग्रेजों के विरूद्व लड़ी गई अपितु सम्पूर्ण भारतीय उप-महाद्वीप और यूरोप के कुछ देशों जैसे:- रूस, इटली, फ्रांस, जर्मनी, क्रोएशिया आदि!दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ देशों जैसे:- कम्बोडिया ताइवान, थाईलैंड, बर्मा, मलाया, सिंगापुर, सुमात्रा, इंडो नेशिया आदि देशों में बसे भारतीयों द्वारा तथा भारतीय उप महाद्वीप में,अफगानिस्तान तथा समस्त उत्तर पश्चिमी भारत तथा उत्तरी-पूर्वी भारत ने इस क्रान्ति में बढ़-चढ़ कर भाग लिया और 'आरजी-हकूमते-हिंद' (IIL) के तहत और इसकी सेना INA में शामिल होकर अंग्रेजों के विरूद्व सफलता से लड़ी!भारतीय नागरिकों(प्रवासी भारतियों) ने भी INA को तन मन धन से सहयोग दिया!स्वयं नागरिकों ने भी सैनिकों के साथ मिल कर लड़ाईयों में,अग्रिम मोर्चों पर भाग लिया !
यह तो हमारे भारत देश का दुर्भाग्य था कि INA की लड़ाई केवल अंग्रेजों से ही नहीं लड़ी गई,अपितु मित्र राष्ट्रों की सम्पूर्ण शक्ति तथा सेना, सहयोगी राष्ट्र अमेरिका की सेना के साथ भी लड़ी गई !
कतिपय कारणों जैसे:- रसद की कमी,मानसून का पहले आ जाना और सप्लाई लाइन का बाधित होना,भारी तोपखाने का न होना,वायु सेना का न होना और प्रमुखता से जापान का नेतृत्व होना,जापान में नागाशाकी और हिरोशिमा पर हुए अणुबम के हमलों द्वारा जापान को मित्र राष्ट्रों के आगे हार मान लेने को विवश हो जाना !
INA फिर भी लड़ती रहती लेकिन गोला-बारूद की कमी से INA को हार का मुंह देखना पडा !
असम तथा समस्त उत्तर-पूर्व के पहाडों और जंगलों से होकर INA ने बर्मा से चलकर कोहिमा, इम्फाल पर हमला किया और मोइरांग में भारतीय झंडा लहराया!जिन छेत्रों से INA,६५ साल पहले गुजरी थी, आज भी भारतीय सेना वहाँ नहीं जा सकती यह था इन बहादुरों का कमाल और उनके देश प्रेम की शक्ति !
INA की हार के उपरांत एक सुनियोजित योजना के तहत नेता जी अलोप हो गये!परन्तु इस क्रान्ति की आग अभी बुझी न थी!इसका नायक अलोप होकर भी इसकी अगुवाई कर रहा था! रेडियो टोक्यो ने २३ अगस्त १९४५ को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का समाचार प्रसारित किया और इस प्रसारण में यह कहा गया था कि उनकी मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को ताइवान (फारमोसा)के ताइहोकू हवाई अड्डे पर एक हवाई दुर्घटना में हो गयी है! यह समाचार सुनकर सारा राष्ट्र स्तब्ध रह गया !
सिर्फ हिन्दुस्तानी ही नहीं, अंग्रेज भी इस समाचार पर स्तब्ध थे! वे इस खबर पर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे!पहले तो अँगरेज़ उसके नेतृत्व में लड़ती INA से और INA के भीतर के प्रोपेगेंडा(प्रचार)से घबराए हुए थे!नेता जी की मृत्यु के एक हफ्ते के भीतर ही बैंकाक(थाईलैंड) में एक अत्यंत उच्चस्तरीय मीटिंग ब्रिटिश प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में २५ अगस्त १९४५ को ही आयोजित की गई थी जिसका केवल और केवल एक ही एजेंडा था- सुभाष चन्द्र बोस !
उनकी मृत्यु की जांच के लिए ताइवान जाने वाला पहला दल भी मित्र राष्ट्रों का प्रमुख सहयोगी अमेरिका ही था, जिसने सितम्बर १९४५ में ही ताइवान जा कर नेता जी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु की सत्यता की जांच की थी!यह रिपोर्ट अमेरिका की प्रमुख जांच एजेंसी CIA के पास ही है !
आजाद हिंद फौज को भारत भूमि में जो कुल क्षेत्र हाथ लगे थे-वे थे अंडमान निकोबार समूह और इम्फाल के युद्घ में कुछ क्षेत्र ही वह विजय कर पाई थी! अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, जापान नेवी का बेस(आधार) था, जिसे पूर्ण रूप से जापानी प्रशासन(नेवी) ने भारतीयों को नहीं सौंपा था !
इसी प्रशासनिक विफलता से मजबूर होकर ही लेफ्टिनेंट कर्नल ए. डी. लोगानाथन ने वहाँ के प्रमुख प्रशासनिक पद (गवर्नर)से इस्तीफा दे दिया था और आजाद हिंद फौज के हेड कवार्टर रंगून वापस चले गये थे !
जापानियों ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह के निवासियों पर बे-इंतिहा जुल्म ढाए थे और अनगिनत हत्याएं की थीं!द्वीप की लगभग सभी स्त्रियों से बलात्कार किया गया था और ४०,००० की आबादी में से ३०,००० को कत्ल कर दिया गया था !
अगले ही वर्ष १९४६ में बम्बई में नेवी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया! यह विद्रोह एकाएक नहीं हुआ था!INA के सैनिकों पर ब्रिटिश सरकार द्वारा मुकद्दमे चलाने का ही यह दुष्परिणाम था! अंग्रेजों द्वारा INA के सैनिकों से दुर्व्यवहार तथा सजाएं देने की कोशिश में, नेवी के सैनिकों ने INA की सहानुभूति में, तथा अंग्रेजों से हिन्दुस्तान आजाद करवाने की कोशिश और मंशा में ही यह विद्रोह किया गया था !
यह विद्रोह बम्बई से शुरू होकर मद्रास (चेन्नई), कलकत्ता आदि बन्दरगाहों पर भी फैल गया था! नेवी के सैनिकों ने नेताजी की तस्वीर हाथों में लेकर सड़कों पर मार्च किया और 'जय हिंद' तथा वन्दे-मातरम्' के नारे लगाए थे!इन विद्रोही सैनिकों ने सभी बड़े सैनिक जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया था और इस तरह अंग्रेजों के लिए भारत से इंग्लैंड लौटना मुश्किल कर दिया था !
नेवी के सैनिकों के साथ ही यह विद्रोह भारतीय सेना में भी फैल गया था!इन परिस्थितियों से अँगरेज़ घबरा गये थे!(उस वक़्त की गुप्तचर रिपोर्ट भी इसे सही ठहराती है), अब अंग्रेजों के पास भारत को आज़ादी देने के सिवाय और कोई चारा न था,और अधिक देर तक वे भारत को गुलाम तथा ब्रिटिश झंडे के आधिपत्य में न रख सकते थे !
परन्तु यह समस्या राजनीतिक थी! उस समय पूरे हिन्दुस्तान में दो ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियां थीं-एक कांग्रेस और दूसरी-मुस्लिम लीग !
दोनों पार्टियां धर्र्मान्धित थीं !
कांग्रेस हिन्दुओं और अन्य गैर मुस्लिमो का प्रतिनिधित्व करती थी,तथा मुस्लिम लीग केवल मुसलमानों का!भारतीय मुसलमान अपना एक स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र चाहते थे परन्तु दोनों ही पार्टियों के नेता अवसरवादी थे !
मुस्लिम लीग के श्री मुहम्मद अली जिन्ना और कांग्रेस के श्री जवाहर लाल नेहरु,दोनों ही भारत के प्रधान मंत्री बनने के इच्छुक थे!यदि नेहरु जिन्ना की मांग मान कर,जिन्ना को ही भारत का प्रधान मंत्री बनवा देते तो इस देश का विभाजन न होता, लेकिन दोनों की ही अवसरवादिता ने इस देश का विभाजन करवा दिया !
अंग्रेजों के मन में सुभाष के करिशमाई व्यक्तित्व का भय था! वे यह तो जान चुके थे कि सुभाष जीवित थे,लेकिन पक्के तौर पर उनके गुप्चार यह बताने में असमर्थ थे कि वे कहाँ हैं? तब भी उनको शक था की नेताजी रूस में हैं लेकिन उसकी पुष्टि के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं था! नेता जी ताइवान से मंचूरिया गये थे और तब २५ अगस्त १९४५ तक मंचूरिया पर रूस का कब्ज़ा था, परन्तु रूस से कोई खबर नेता जी के जीवित होने की तथा रूस में होने की,अंग्रेजों को नहीं मिली थी! अँगरेज़ नेता जी से भयभीत थे और उनकी कथित हवाई दुर्घटना में हुई मृत्यु की खबर से भ्रमित थे !
अँगरेज़, सुभाष द्वारा सेना के गठन से और उनकी संगठनात्मक शक्ति से इतने भयभीत थे कि उनके मन में सुभाष का डर बैठ गया था कि कहीं नेता जी दुबारा सेना का गठन करके उन पर आक्रमण न कर दें क्योंकि तब तक द्वितीय विश्व युद्घ समाप्त हो चुका था और भारतीय सैनिकों में, भारत की सेना के तीनो अंगों में, सुभाष की क्रान्ति का आगाज़ स्पष्ट संकेत देते थे कि वे जल्दी से जल्दी हिन्दुस्तान छोड़ दें !
यह भी इस महान राष्ट्र का दुर्भाग्य ही तो था जो INA को आत्म समर्पण करना पडा,वह भी विजय दुन्दुभी बजाती सेना जो दक्षिण-पूर्व में सिंगापूर से थाईलैंड, बर्मा होती हुई, भारत के उत्तर-पूर्व में इम्फाल तक आ गई और भारत भूमि में प्रवेश करते ही कतिपय दैवीय कारणों से उसे हार का मुंह देखना पडा!इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती थी उन वीरों के लिए ?
यदि INA जीत जाती, और उसका प्रवेश भारत भूमि में और उसकी विजय दुन्दुभी दिल्ली में सुनाई देती,अंग्रेजों को हराकर इस देश पर सुभाष का शासन होता तो देश के बंटवारे की राजनीति का लाभ इन अवसरवादियों को न मिलता! न ही इस देश के टुकड़े होते और न ही मुस्लिम लीग या कांग्रेस का नामो निशान होता!इन राजनीतिकों की सभी चालें विफल हो जातीं और भारत एक महासंघ एवं महाशक्ति सम्पन्न देश होता! इसकी सीमाएं पश्चिम में ईरान,अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बर्मा तक होतीं !
INA के २५,०० सैनिकों को गिरफ्तार करके दिल्ली ले आया गया और उन पर मुकद्दमे की कार्रवाई शुरू की गई!इतने सारे मुकद्दमे एक साथ नहीं निपटाए जा सकते थे अत: कैदियों को तीन श्रेणियों में बाँट दिया गया !
१- व्हाइट:- वे सैनिक, जिन्होंने यह बयान दिया कि वे इन सैनिकों की देखा - देखी में गए या मजबूर किये गए जबकि उनका कोई कसूर न था! ऐसे लोगों को फिर से उनकी यूनिट में बहाल कर दिया गया था !
२- ग्रे:- जिन्हों ने कहा कि इन के सैनिकों ने बहकाया,तथा अँगरेज़ सरकार से माफ़ी मांगी, उन्हें पैसे भी दिए गए परन्तु उनकी नौकरी समाप्त करके उन्हें,उनके घरों को भेज दिया गया !
३- ब्लैक:- वे सैनिक, जिन्हों ने कतई माफ़ी नहीं मांगी, उन्हें कुछ नहीं दिया गया और नंगे ही छोड़ दिए गए !
इस तरह अँगरेज़ धीरे-धीरे कैदियों को छोड़ने लगे !
INA के सैनिकों पर कार्रवाई करने के लिए दिल्ली के लाल किले को छावनी में तब्दील कर दिया गया था!इन अपदस्थ सैनिकों पर मुकद्दमे चलाने के लिए लाल किला ही सबसे सुरक्षित स्थान था जहां इन पर मुक़द्द्मा आसानी से चलाया जा सकता था! ये सैनिक सबसे सुरक्षित स्थान पर थे तथा मीडिया एवं प्रेस भी आसानी से वहाँ पहुँच सकते थे !
५ नम्बर १९४५ को शाहनवाज़ खान,प्रेम कुमार सहगल,और गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर मुकद्दमा चलाया गया! यह मुकद्दमा ३१ दिसम्बर तक चला!जी. एस. ढिल्लों पर हत्या का, तथा पी. के. सहगल एवं शाहनवाज़ खान पर हत्या में सहयोग एवं साजिश करने का मुकद्दमा चला !
इन तीनो पर अंग्रेजी हकूमत व बादशाह के विरूद्व युद्घ करने का आरोप लगाया गया! यह सारा मुकद्दमा अति-सम्वेदनशील था परन्तु इसके परिणाम क्लाउड औचिनलेक के मन मुताबिक नहीं निकले !
नेहरु के अनुसार यह मुकद्दमा दो प्राचीन प्रतिद्वंदियों, भारत तथा इंग्लैंड के बीच की प्रतिस्पर्धा का एक नाटकीय रूपांतरण था जिसमें भारतीय इसे गैर कानूनी मानते थे तो अँगरेज़ इसमें अपनी जीत की ख़ुशी देखते थे !
श्री भूला भाई देसाई ने मुख्यत: राष्ट्र के सम्मान के लिए स्वतंत्रता संग्राम और शहादत की वकालत की तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता को प्रत्येक देशवासी का अधिकार बताया! फिर भी अंग्रेजों ने इन तीनों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई और इन्हें इनकी नौकरी के साथ इनकी पेंशन तथा अन्य भुगतान भी जब्त कर लिए !
हलाँकि ब्रिटिश सरकार इस मुकद्दमे के दुष्परिणामों से अनभिज्ञ न थी! मुकद्दमे के शुरूआती दिनों में ही दक्षिण भारत के मदुरै में उसे प्रदर्शन-कारियों पर गोली चलानी पड़ी थी !
INA के पक्ष में सारे देश में एक स्वर से आवाज़ बुलंद होनी प्रारम्भ हो गई थी!
कमाल की बात तो यह हुई कि इस मुकद्दमे के तीन मुख्य आरोपी,भारत के तीन मुख्य धर्मों के प्रतिनिधि,आकर्षण एवं नेतृत्व के प्रतीक बन गए थे !
१- शाहनवाज़ खान -मुस्लिम सम्प्रदाय के प्रतिनिधि,
२- प्रेम कुमार सहगल -हिन्दू समुदाय के प्रतिनिधि,
३- गुरबख्श सिंह ढिल्लों -सिख समुदाय के प्रतिनिधि !
जनरल औचिनलेक के अनुसार,इस मुकद्दमे के परिप्रेक्ष्य और परिणति में भारतीय राजनीति पर धार्मिक दबाव दिखाई देता था!
इसके विपरीत भारतीय जन-मानस ने इसे सिद्धांत रूप में,हिन्दू,सिख, व मुस्लिम भाईचारे व एकता तथा सही मायने में इसे राष्ट्रीय सेना का सम्मान दिया !
४ फरवरी १९४६ को,कैप्टेन अब्दुल रशीद को ७ साल की सज़ा सुनाई गई! वे एक मुस्लिम थे! ११ से १४ फरवरी १९४६ तक दिल्ली, बम्बई,व कलकत्ता में हिन्दुओं व मुसलमानों ने मिलकर INA के पक्ष में राजनीतिक प्रदर्शन किए!कलकत्ता में ४ दिनों तक मार्शल ला लागू किया गया, जिसमें ५० के करीब व्यक्ती मारे गए और ५०० से अधिक जख्मी हुए !
द्वितीय विश्व युद्घ भारत की आज़ादी की नई किरण लेकर आया था! देश की उस समय की राजनीतिक शान्ति ने अंग्रेजों को इस मुकद्दमे के प्रति आशान्वित कर दिया था तथा वे स्थिति को समझ नहीं पाए थे! इधर अँगरेज़ अपनी जीत की खुशियाँ मना रहे थे तो उधर भारतीय जनता उग्र हो उठी!दिल्ली के टाऊन हाल को आग लगा दी गई हलाँकि कुछ हिस्सा ही जला! जो भारतीय विदेशी वेश-भूषा पहनते थे, उन पर भी हमले किए गए! परेड करते सैनिकों को भी निशाना बनाया गया!पुलिस को जनता को नियंत्रित करने के लिए गोली चलानी पडी !
INA और सुभाष ने तो क्रान्ति ही ला दी थी - एक सफल क्रान्ति, एक ऐसी क्रान्ति जिसका लाभ उठाने के लिए राजनीतिक अवसरवादिता सक्रिय हो उठी! इस अवसर-वादिता का प्रमुख लाभ कांग्रेस ने उठाया !
कांग्रेस को युद्घ में काफी नुक्सान उठाना पडा था, जनता में उसकी छवि धूमिल हुई थी! इसे अंग्रेजों से वार्ताओं में और जन-आन्दोलनों से कम ही लाभ मिला था! अब तो यह ऐसा मुद्दा था कि यदि कांग्रेस कोई राय भी देती मुस्लिम लीग मना कर देती थी !
ऐसे मौके पर कांग्रेस ने INA की आड़ में अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया और इसने अवसरवादिता का लाभ उठाते हुए फौरन ही INA की कारवाईयों को उचित करार दिया और इसे अपने पूर्ण समर्थन देने और INA की तरफ से मुकद्दमा लड़ने की अपनी इच्छा जाहिर की तथा घोषणा की कि वे सभी सैनिकों तथा अफसरों को बचाने के लिए मुकद्दमे की कारवाई में भाग लेगी! अहिंसा की पैरवी करने वाली पार्टी भी अंतत:हिंसा को समर्थन देने को मजबूर हो गई!
हालंकि मुहम्मद अली जिन्ना ने भी सरकार को INA के प्रति नरमी दिखाने को कहा था! परन्तु अब तक तो भारतीय प्रेस भी, युद्घ में लागू प्रेस सेंसर शिप से मुक्ति पा चुकी थी !
'जय हिंद' के नारे ने आपसी भाई चारे में, भारतीय जन-मानस में प्रमुख स्थान पा लिया था! सुभाष चन्द्र बोस के वर्दी वाले फोटो तो प्रत्येक पान वाले की दूकान से लेकर हर मुख्य स्थान की शोभा बढा रहे थे!
जो प्रचार-प्रसार INA को युद्घ के दौरान न मिला होगा, उससे अधिक,वे अब भारतीय जन-मानस में पा चुके थे! INA की शौर्य-गाथाएँ अब जगह-जगह सुनाई देती थीं !
श्री प्रेम कुमार सहगल, जो कि INA के एक अधिकारी और मिलिट्री सचिव भी थे, उन्होंने लाल किले में मुकद्दमे के दौरान एक बात कही थी और यह स्वीकारोक्ति की थी कि यद्यपि युद्घ शुरू हो चूका था फिर भी एक दुविधा बनी हुई थी कि जापान की जीत होगी या नहीं,परन्तु एक बात तो निश्चित थी कि भारतीयों के निचले स्तर तक INA की मुहिम का प्रभाव पड़ चुका था और किन्ही कारणों से यदि जापान हार भी जाता तो भी अंग्रेजों को भारतीय उप-महाद्वीप में शासन करना लगभग असम्भव हो जाता!यही INA और IIL का अंतिम उद्देश्य था!इसमें उन्हें पूर्ण सफलता भी मिली और यही उद्देश्य १९४६ के नेवी विद्रोह का कारण भी बना !
जनवरी १९४६ में ही RIAF (ROYAL INDIAN AIR FORCE) के लगभग ५२०० वायु सैनिकों ने, INA के समर्थन में हड़ताल कर दी थी और १८ फ़रवरी को बम्बई में, ब्रिटिश नौ-सेना के जहाज़ HMS TALWAR पर नेवी के सभी सैनिकों ने भारी विद्रोह कर दिया !
केवल दो दिनों में ही देश की लगभग सम्पूर्ण नेवी सेना विद्रोह में शामिल हो गई! देश के विभिन्न बंदरगाहों-कोचीन, कलकत्ता, विशाखापत्तनम, मद्रास, बम्बई, तथा कराची में ७८ जहाजों पर विद्रोही सैनिकों ने कब्ज़ा कर लिया तथा नेवी के मुख्यालयों से इंग्लैंड का राष्ट्रीय झंडा'यूनियन जेक' उतार दिया गया!अंग्रेजों के पास अब केवल १० जहाज़, तथा २ मुख्यालय ही बचे थे !
इसका प्रभाव देश की अन्य(सेना के अन्य भागों)पर भी फौरन ही पडा ! अत: २२ से २५ फ़रवरी तक के बीच बम्बई व मद्रास में भी वायु सैनिक भी हड़ताल में शामिल हो गए!बम्बई तथा कराची में नेवी के विद्रोही सैनिकों की संख्या में आश्चर्य जनक रूप से बढोतरी हुई !
कराची में विद्रोही सैनिकों तथा अंग्रेजों में भयंकर गोलीबारी हुई ! अंग्रेजों ने विद्रोही सैनिकों को कुचलने के लिए भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया और अंत में इन देश प्रेमी, विद्रोही सैनिकों को हार का मुंह देखना पडा!बम्बई में तो नेवी सैनिकों के समर्थन में मिल मजदूरों(लगभग ६ लाख) ने भी INA का समर्थन करते हुए हड़ताल कर दी!तीन दिनों तक बम्बई की गलियों में कई स्थानों पर अंग्रेजों तथा हड़तालियों में झड़पें हुईं!अंग्रेजों के पास टैंक, तोपें,और मशीनगनें थीं! मिल मजदूरों के पास कुछ छोटे हथियार व गलियाँ खोद कर इकट्ठे किये गए पत्थर ही थे!अंत में २७० की मृत्यु हुई और १३०० के करीब जख्मी हुए !
बिना शक,क्रान्ति की ज्वाला अपने उच्चतम शिखर पर थी परन्तु इन क्रांतिकारियों का अब कोई नेता न था! नेवी के सैनिक नेवी से तो परिचित थे परन्तु राजनीतिकता से अनजान!भारतीय राजनीतिक पार्टयों को इन नेवी के सैनिकों में, विद्रोहियों के रूप में भारतीय राष्ट्रीय नेवी तो दिखाई दी परन्तु उन्हें इसमें अपने लिए ख़तरा भी नज़र आ रहा था !
जिन्ना ने विद्रोहियों को वापस जाने की सलाह दी! यदि वे वापस जाते तो जिन्ना उनकी तरफ से खराब भोजन तथा उनके बुरे हालत की अर्जी देकर उनके समर्थन में उतरता! कांग्रेस तो इस क्रान्ति से भयभीत हो चुकी थी! यह तो भगवान् ही जानता था कि यदि विद्रोहियों का कोई नेता होता-यदि सुभाष स्वयं होते !
अंतत: अंग्रेजों ने अपने जहाजों पर पुन: कब्ज़ा कर लिया !
भारतीय राजनीतिज्ञ तो इस विद्रोह से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सके लेकिन अंग्रेजों ने इससे सबक ग्रहण कर किया! अंतत:ब्रिटिश पार्लियामेंट और प्रधान मंत्री एटली को यह विश्वास हो गया कि अब भारत को और गुलाम बना कर नहीं रखा जा सकता !
बल प्रयोग द्बारा कुछ और साल राज किया जा सकता था किन्तु अँगरेज़ सरकार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती !
सच्चाई तो यह है कि INA का उत्थान एवं पतन, दोनों से उत्पन्न परिस्थितियाँ, जापान से प्रगाढ़ता,सैन्य मदद, जापान द्वारा बर्मा को आधिपत्य में लेना, इन्डोनेशिया तथा अन्य दक्षिण-पूर्वी देशों पर भी सैन्य आक्रमणों द्वारा अधिकार करना, जर्मनी तथा इटली द्वारा INA को सहयोग करना, जापानियों द्वारा पराजित देशों के सैनिकों तथा नागरिकों पर अत्याचार और इस सब में INA के सैनिकों का जापानी सेनाओं से सहयोग का दोषारोपण, INA के सैनिकों और इसके उद्देश्य पर भी प्रश्न-चिन्ह लगाता है !
INA पर जापानी सेना का वर्चस्व, इसे महत्वहीन बनाता है, जबकि सुभाष ने इसे स्वतंत्र सेना का रूप दिया और इसके स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखा, फिर भी यह जापानी सेना और जापान सरकार पर निर्भर थी! इसके द्वारा पकडे गए ब्रिटिश सैनिकों पर अमानवीय अत्याचारों के आरोप भी हैं, फिर भी INA द्वारा आत्म समर्पण और भारतीय प्रचार माध्यमों द्बारा जनता में इसके प्रति रुचि और सहानुभूति ने तथा ब्रिटिश राज के खिलाफ इनकी लड़ाई ने, इन्हें भारतीय जन मानस में इन INA सैनिकों के प्रति संवेदना और ब्रिटिश कारवाई के खिलाफ माहौल पैदा किया अंतत:लगभग सभी २५,००० कैदियों को ब्रिटिश सरकार ने रिहा कर दिया !
अंग्रेजों को भारत अति-शीघ्र छोड़ने का निर्णय लेना पडा! भारत में व लन्दन में ब्रिटिश सरकार,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,व मुस्लिम लीग के बीच कई वार्ताएं हुईं और जब अंग्रेजों ने देखा कि न तो कांग्रेस और न ही मुस्लिम लीग, अपने फैसले से हटने को तैयार है यानि अपनी-अपनी जिद पर दोनों पार्टियाँ अड़ी हुई थीं तो उन्होंने एक परिवार के दो हिस्से कर, दोनों को ही मुखिया बना दिया !
महान भारत देश का विभाजन करके दोनों नेताओं को ही, (नेहरू और जिन्ना), इन दोनों को ही विभाजित मुल्कों, हिन्दू राष्ट्र व मुस्लिम राष्ट्र का प्रधान मंत्री बना दिया! पाकिस्तान ने स्वयं को मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया,जबकि कांग्रेस ने इसे सेक्युलर इंडिया या धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया!यह एक ऐतिहासिक भूल है जिसकी कीमत हिंदुस्तान को भविष्य में भी चुकानी पड़ेगी !
लार्ड माउन्टबेटन द्वारा भारत सरकार को,भारत की आज़ादी से पहले नेहरू को रखी गई शर्तों में से एक थी-आजाद हिंद सेना के भूतपूर्व सैनिकों को और नेवी के विद्रोही सैनिकों को,आजाद भारत की सेना में नहीं रखा जाएगा और कांग्रेस सरकार ने देश की आज़ादी की बागडोर संभालने,भारत पर शासन करने की खातिर, लार्ड माउन्टबेटन की इस शर्त को स्वीकार कर लिया !
आज़ादी के लिए,देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सैनिकों को नंगे ही, बिना किसी आर्थिक सहायता के या पुरस्कार के उन्हें, उनके घर का रास्ता दिखा दिया गया !
दूसरों के घर की रोटी छीनकर भी, यदि हमें ऐश मिलती है, सुख- समृधि से भरपूर जिन्दगी मिलती हो, तो क्या हर्ज़ है :--
"कुर्बानी तुम्हारी --------------------देश के लिए कुर्बान तुम हो !"
शासन हम करेंगे !!
यह थी कांग्रेस की नीति !!
और तो और, इन सैनिकों को पुलिस में भी भरती करने पर भी रोक लगा दी गई थी!
इन वीर सैनिकों, देश भक्त सैनिकों को मातृभूमि और देश सेवा का यह पारिश्रमिक स्वतंत्र भारत की सरकार द्वारा दिया गया था !
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!! सुभाष चन्द्र बोस का परिचय !!
सुभाष की प्रारम्भिक शिक्षा एक ईसाई स्कूल 'बैप्टिस्ट स्कूल' में हुई और बाद में वे कटक के RAVENSHAW COLLEGE से शिक्षा ग्रहण (बी.ए.) करने लगे ! यहाँ पर अंग्रेजी शिक्षकों द्वारा भारतीय छात्रों को निरादर करते देख उन्हों ने विरोध किया ! अंत में उन्हें इस कालेज से निकाल दिया गया ! तब सुभाष ने कलकत्ता के ही SCOTTISH CHURCH COLLEGE से GRADUATION किया ! उन्हों ने प्रथम श्रेणी से बी.ए. किया था तथा उन्हों ने कलकत्ता विश्व विद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया था !
उनकी इस सफलता से प्रसन्न हो कर उनके पिता जानकी नाथ बोस ने उनसे इंग्लैंड जाकर 'भारतीय सिविल परीक्षा' (ICS) की तैयारी करने को कहा ! अत: अक्टूबर १९१९ में वे लन्दन पहुँच गए! लन्दन पहुँच कर सुभाष ने कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के FITZWILLIAM COLLEGE में दाखिला लिया और सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करने लगे ! अगले वर्ष १९२० में उन्हों ने सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्होंने ICS की RANKING में चौथा स्थान प्राप्त किया !
उधर भारत में घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदल रहे थे ! १३ अप्रैल १९१९ को जनरल डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में हजारों निहत्थे हिन्दुस्तानियों को गोलियों से भून डाला था जो एक सभा करने पहुंचे थे, युवा भारतीयों के हृदय में दावानल धधक रहा था तो दूसरी और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने अगस्त १९२० में 'असहयोग आन्दोलन' का श्री गणेश किया ! भारत के सभी बड़े शहरों में हड़ताल होने लगी, जलसे होने लगे और जगह-जगह आन्दोलन के समर्थन में जलूस निकलने लगे ! भारतीय जनता विदेशी माल का बहिष्कार करने लगी, विदेशी कपडों की होली जलने लगी ! वकीलों ने भी इस आन्दोलन को अपना समर्थन दे डाला !
यह सब समाचार भारत से लन्दन पहुँच रहे थे जिनसे सुभाष उद्वेलित हो उठे और १९२१ में ही उन्हों ने आई सी एस से त्यागपत्र दे दिया ! उनके इस निर्णय से उनके पिता जी जानकीदास बोस तथा परिवार के सदस्यों को निराशा हुई लेकिन सुभाष अपने निर्णय पर अडिग रहे ! उनके हृदय में तो देश प्रेम अंगडाई ले रहा था ! उन्हों ने देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर ही अपना त्यागपत्र दिया था ! उनकी मातृभूमि-भारत भूमि उन्हें पुकार रही थी ! अत: उन्हों ने भारत की राह ली !
बम्बई पहुँच कर वे सीधे महात्मा गांधी से मिलने गए ! गांधी जी से एक लम्बी वार्ता हुई और सुभाष असहयोग आन्दोलन से प्रभावित हुए! आन्दोलन और भावी योजनाओं को लेकर विचार विमर्श हुआ ! अंत में उन्हों ने 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' में शामिल होने की इच्छा जतायी और उन्हों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की ! महात्मा गांधी ने सुभाष को कलकत्ता जा कर श्री चितरंजन दास की अध्यक्षता में काम करने को कहा ! अत: सुभाष ने कलकत्ता पहुँच कर श्री चितरंजन दास से मुलाक़ात की और उनकी अध्यक्षता में कार्य करने लगे ! श्री चितरंजन दास भी एक बंगाली वकील थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख स्तंभों में से एक थे !
श्री चितरंजन दास, सुभाष के देश प्रेम के विचार सुनकर ओ़त-प्रोत हो उठे और उन्होंने ने भी सुभाष के साथ काम करने का मन बनाया ! सुभाष श्री चितरंजन दास से काफी प्रभावित थे और उन्हों ने (सुभाष ने) चितरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरु मान लिया ! श्री मोतीलाल नेहरू एवं चितरंजन दास भारतीय राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं या स्तम्भों में से थे !
सुभाष ने चितरंजन दास की अध्यक्षता में 'बंगाल कांग्रेस कमेटी" की सदस्यता ग्रहण की और राष्ट्रीय आन्दोलन की गतिविधियों को तेजी प्रदान की ! १७ नवंबर १९२१ को 'प्रिस आफ वेल्स' का आगमन हुआ ! (प्रिंस आफ वेल्स की सम्मानित व्यक्ति ही भविष्य में इंग्लैंड साम्राज्य का स्वामी अर्थात महाराजा घोषित होता है), समस्त भारत में उनके आगमन का विरोध होने लगा ! कलकत्ता में इनके विरोध का पूरा दायित्व सुभाष पर था ! कलकत्ता में हड़ताल सफल रही !
राष्ट्रव्यापी असहयोग आन्दोलन से और प्रिंस आफ वेल्स के भारत आगमन पर विरोध से ब्रिटिश सरकार विचलित हो उठी ! वह भारत पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहती थी ! इस कारण ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों पर अपना दमन चक्र और तेज कर दिया ! आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारियां होने लगीं ! श्री चितरंजन दास और सुभाष को २५,००० अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ (कलकत्ता में) गिरफ्तार कर लिया गया दोनों को ६ माह तक जेल में रखा गया !
उधर असहयोग आन्दोलन पर महात्मा गांधी की पकड़ कमजोर हो रही थी ! १ फ़रवरी १९२२ को गोरखपुर के चौरी-चौरा में, में दोनों गाँवों के लोग इकट्ठा थे, चौरा गाँव में शराब की दूकान पर कुछ स्वयंसेवक धरना दे रहे थे जिनकी पुलिस ने पिटाई कर दी ! ४ फ़रवरी १९२२ को तीन-चार हज़ार ग्रामीणों ने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ चौरा पुलिस थाने के सामने प्रदर्शन किया परन्तु कुछ मध्यस्थों के समझाने जब प्रदर्शनकारी वापिस जाने लगे तो पीछे वाले प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने तंग करना शुरू कर दिया ! प्रदर्शनकारी पुन: वापिस आ गए ! पुलिस ने गोली चलानी शुरू कर दी और तब तक गोली चलाते रहे जब तक असला ख़तम नहीं हो गया ! इसके बाद पुलिस ने थाने में शरण ली ! इस गोलीबारी में तीन ग्रामीण शहीद हो गए ! गुस्से से उफनती भीड़ ने थाने में आग लगा दी जिसमें २२ पुलिसकर्मी मारे गए !
११ फ़रवरी को बारदौली में मीटिंग करके (जबकि चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपतराय जैसे नेता जेल में बंद थे) गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापिस ले लिया ! गोरखपुर में २२५ ग्रामीणों को चौरी-चौरा के अपराध में पकडा गया, जिनमें से १९ को फांसी हुई और बाकी को देश निकाला ! गाँधी, नेहरू जैसे देशभक्तों ने इस सरकारी हिंसा के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला जबकि आज भी उन २२ पुलिस कर्मियों की याद में तो वहाँ शहीद स्मारक है और उन देश-भक्तों के बारे में कांग्रेस इतिहास चुप है जो गाँधी, नेहरू, जैसे देशभक्तों के कारण बेनाम शहीद हो गए या देश से निकाले गए !
इन सब कारणों से अप्रसन्न होकर कलकत्ता कांग्रेस कमेटी के सदस्यों ने चितरंजन दास को अध्यक्ष नियुक्त किया ! वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन लाना चाहते थे ! अत: उन्हों ने कमेटी के समक्ष प्रस्ताव रखा परन्तु प्रस्ताव पास न हो सका ! खिन्न होकर चितरंजन दास ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया ! तत्पश्चात मोतीलाल नेहरु से विचार विमर्श करके उन्हों ने एक नई पार्टी ' स्वराज पार्टी' की स्थापना की ! श्री मोतीलाल नेहरु इस पार्टी के जनरल सेक्रेट्री थे तथा सुभाष प्रचार-प्रसारक !
अप्रैल १९२४ में ' कलकत्ता नगर निगम' का चुनाव हुआ इसकी अधिकतम सीटों पर 'स्वराज पार्टी' को सफलता मिली ! सुभाष इसके मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त हुए ! अपने कार्यों से वे कलकत्ता वासियों के हृदय पर छा गए ! तब भी वे विदेशी कपडों का बहिष्कार करते रहे ! इसी बीच एक क्रांतिकारी गोपीनाथ साहा ने एक अंग्रेज 'डे' को गोली मार दी जबकि उसका निशाना 'चार्ल्स' नामक अंग्रेज था ! अंग्रेज सरकार ने गोपीनाथ साहा को फांसी पर लटका दिया ! गोपीनाथ ने जो अपना अंतिम सन्देश भारतीय जनता को दिया था, "उसमें कहा था कि उसके शरीर से निकलने वाले खून का हर कतरा देश वासियों के दिल में आज़ादी का बीज बोएगा और आने वाले दिनों में भारत माता, अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो जाएगी !" सुभाष ने समाचार पत्रों में यह पढ़ कर कांग्रेस पार्टी की सभा बुलाकर गोपीनाथ साहा के बलिदान की सराहना की और एक अन्य प्रस्ताव द्वारा ब्रिटिश सरकार की निंदा भी की गई !
इससे ब्रिटिश सरकार बौखला गई और सुभाष को बंगाल की आतंकवादी गति-विधियों की शंका में २५ अक्टूबर १९२४ को गिरफ्तार कर लिया गया ! पहले उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया, परन्तु जनवरी १९२५ में उन्हें मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया !
यहाँ रह कर सुभाष को बर्मा के बारे में जानने का अवसर मिला और उन्हें यह भी समझ आ गया कि बर्मा के लोग अंग्रेजों से नफरत करते हैं और कि बर्मा की संस्कृति, भारत से बहुत मिलती है ! यह बात भविष्य में उनके बहुत काम आई !
१६ जून १९२५ को श्री चितरंजन दास मृत्यु को प्राप्त हुए ! सुभाष के लिए यह आघात सहना बहुत मुश्किल था !
१६ मई १९२७ को सुभाष जेल से रिहा हुए और फौरन बाद कलकत्ता के मेयर चुन लिए गए ! उधर भारत में क्रांतिकारी विचारधारा जोर पकड़ रही थी ! १९२४ में ही 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी' का गठन हो चूका था ! क्रांतिकारियों ने ९ अगस्त १९२५ को काकोरी स्टेशन के पास रेल रोक कर सरकारी खजाना लूट लिया था परन्तु सरकार ने प्रमुख क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया और अनेकों को फांसी दे दी थी, जिनमें प्रमुख थे - राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिडी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान ! क्रांतिकारियों ने इस विषम परिस्थिति में भी अपना धैर्य नहीं खोया और हौंसला बनाए रखा !
१७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ 'सांडर्स' नामक एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी थी ! यह ह्त्या तो उन्हों ने 'स्कॉट' नामक पुलिस अधिकारी की करनी थी जो कि लाला लाजपतराय जी पर लाठी बरसाने का आरोपी था ! गलती से वहाँ पर 'सांडर्स' आ गया और उसकी ह्त्या हो गई !
देश में क्रांतिकारी संगठन को मजबूती देने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने पंजाब असेम्बली में बम फेंका जो कि खाली आवाज़ करने वाला था, उसमें मारक खमता नहीं थी ! असेम्बली में ही भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करवा दिया ! २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह को राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी दे दी गई !
सुभाष, अभी तक कांग्रेस को मजबूत करने का प्रयास कर रहे थे लेकिन गांधी जी द्वारा अनेक बार अंग्रेजों के समर्थन में होने से गांधी और सुभाष में मतभेद गहराने लगे ! उधर जेल में जतिनदास की भूख हड़ताल से मृत्यु हो गई, पूरा देश क्षुब्ध था-गांधी नहीं ! गांधी ने अपनी अखबार 'यंग इंडिया' में इसे नहीं छापा, लेकिन लार्ड इर्विन पर हुए जानलेवा हमले को प्रमुखता से छापा था !
इस पर सुभाष ने उनकी आलोचना भी की थी !
लगभग २० वर्षों के अन्तराल में, ब्रिटिश सरकार ने सुभाष को ग्यारह बार गिरफ्तार किया और १९३३ के मध्य में उन्हें देश निकाला देकर यूरोप भेज दिया गया, जहां वे लोगों की भीड़ में भारत की स्वतन्त्रता की अलख जगाए रखने के लिए भाषण देते थे और मीटिंगों का आयोजन करते थे ! सुभाष लगभग चार वर्षों तक यूरोप में रहे और इस दौरान उन्हों ने लगभग सभी यूरोपीय देशों का दौरा किया ! वे देश की आज़ादी के लिए एक नए विकल्प की तलाश में थे ! इस सिलसिले में उन्हों ने यूरोप की अनेक प्रमुख राजनीतिक हस्तियों और विचारधारा के लोगों से मुलाक़ात की ! इस से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत को राजनीतिक स्वतन्त्रता केवल तभी प्राप्त हो सकती है जब उसे विदेशों से राजनीतिक, कूटनीतिक एवं सैन्य सहायता प्राप्त हो तथा एक स्वतंत्र राष्ट्र को स्वतंत्र प्रभुत्व बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय सेना की भी आवश्यकता होगी !
विश्व की राजनीतिक और आर्थिक दशा में तेजी से बदलाव आ रहे थे १९२९ का आई विश्व व्यापी मंदी से सभी देश उबरने में लगे थे ! रूस में १९१७ की बोल्शेविक क्रान्ति में जार का तख्ता पलट कर, लेनिन-साम्यवादी दल का एकछत्र नेता बन चुका था ! उसकी मृत्यु के पश्चात 'स्टालिन' ने रूस में सता संभाली ! उसने अपनी आतंकवादी नीति से विरोधियों पर कहर ढाया और संहार किया ! उसके बाद में सम्पूर्ण रूस में श्रमिक संगठनों और कृषक संगठनों का आधिपत्य स्थापित हुआ !
दूसरी तरफ इटली में भी मुसोलिनी ने संसदीय शासन व विरोधी दलों को समाप्त करके फासिस्ट शासन स्थापित किया !
यूरोप का ही एक अन्य देश जर्मनी, प्रथम युद्घ की अपनी हार से अभी तक उबर नहीं पाया था ! उसके राजनीतिक पटल पर हिटलर १९३३ में एक सितारा बन कर उभरा ! देश के सभी राजनीतिक दलों को भंग करके वह जर्मनी का तानाशाह बन गया !
६ मार्च १९३३ को सुभाष इटली पहुंचे ! वहाँ के भारतीयों ने उनका भव्य स्वागत किया, वे वहाँ भी अपने देश भारत की आज़ादी का वातावरण तैयार करने हेतु प्रयासरत रहे !
वियना में एक पत्रकार सम्मेलन में सरदार पटेल के भाई, विट्ठल पटेल ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया जिसमें गाँधी जी के अनशन की कटु आलोचना की गई थी और कांग्रेस को एक नए नेता की तलाश की सलाह भी दी गई थी, इस सम्मलेन में गांधी को एक असफल नेता भी घोषित किया गया था !
अपने यूरोप प्रवास के दौरान सुभाष ने पश्चिमी देशों की क्रांतिकारी परिस्थितियों का बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन किया ! आम आदमी के उत्थान के लिए किए गए प्रयासों और कानूनों का भी गहराई से विमोचन किया ! वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देश में राष्ट्रीय चेतना के विकास एवं प्रसार तथा प्रचार के लिए युवा वर्ग को नेतृत्व देना होगा ! इसी बीच उनके पिता श्री जानकीदास बोस की एक गंभीर बीमारी से मृत्यु हो गई ! उनकी अंतिम क्रिया में भाग लेने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सुभाष को भारत लौटने की इजाज़त दे दी ! ब्रिटिश सरकार की कड़ी निगरानी में सुभाष, अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुए परन्तु इसके फौरन बाद ही उन्हें यूरोप वापस जाना पडा !
सुभाष ने १९३६ के मार्च महीने में फिर भारत जाने की योजना तैयार की ! लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन के लिए वामपंथियों ने सुभाष को आमंत्रित किया था ! श्री जवाहरलाल नेहरू भी उन दिनों अपनी पत्नी कमला नेहरू के इलाज़ के लिए स्विटज़रलैंड आए हुए थे ! उन्हों ने सुभाष से मुलाक़ात की और बाद में भारत पहुँच कर नेहरु ने सुभाष को भारत न आने की सलाह दी लेकिन सुभाष नहीं माने ! नेहरू को सुभाष की गिरफ्तारी का भय था लेकिन सुभाष अपनी जिद पर थे ! जैसे ही सुभाष बम्बई पहुंचे, उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया ! इस तरह सुभाष लखनऊ अधिवेशन पहुँचने से वंचित रह गए !
नेहरू जी ने सुभाष की गिरफ्तारी को अनुचित ठहराया और सुभाष की रिहाई को कांग्रेस की कार्य समिति ने प्रमुखता से उठाया ! सुभाष की रिहाई की मांग को लेकर पूरे देश में हड़तालें शुरू हो गईं ! उधर सुभाष की तबियत भी खराब हो गई ! सुभाष की रिहाई को लेकर ब्रिटिश सरकार पर भी दबाव बढ़ रहा था ! अंत में मजबूर होकर सरकार ने १७ मार्च १९३७ को उन्हें रिहा कर दिया ! तब सुभाष इलाज़ कराने डलहौजी चले गए ! कुछ समय बाद वे ठीक होकर कलकत्ता आए और वहाँ से वे फिर यूरोप चले गए !
आस्ट्रिया पहुँच कर उन्हों ने अपनी सेक्रेटरी 'एमिली शेंकेल '(EMILY SHANKEIL) से (BAD -GASTEIN) शहर में २६ दिसम्बर १९३७ को गुपचुप रूप से शादी की ! यह शहर आस्ट्रिया में लगभग ३५०० फीट की ऊंचाई पर, राष्ट्रीय पार्क (HONE TAUREIN) में स्थित है !
२४ जनवरी १९३८ को सुभाष फिर स्वदेश लौट आए ! हरिपुरा में कांग्रेस अधिवेशन की तैयारियां हो रही थीं ! बारदौली होते हुए वे हरिपुरा पहुंचे जहां उनका भव्य स्वागत किया गया ! जवाहरलाल नेहरू, सुभाष को अध्यक्ष पद पर आसीन देखना चाहते थे अत: उन्होंने अध्यक्ष पद हेतु सुभाष का नाम लिया !
गाँधी जी, सुभाष के क्रांतिकारियों से मेलजोल और उनके अंग्रेजों के प्रति आक्रोश को हिंसा के प्रभाव में देखते थे अत: उन्हों ने पट्टाभि सीतारामेय्या को चुनाव लड़ने के लिए मना लिया और इसकी आधिकारिक घोषणा भी कर दी सुभाष ने इसे पक्षपात करार दिया और चुनाव लड़ने पर आमादा रहे ! अंत में , सुभाष ने पट्टाभि सीतारामेय्या को भारी मतों के अंतर से हराया ! गाँधी ने इस हार को अपनी हार माना और टिप्पणी की, "पट्टाभि सीतारामेय्या की हार मेरी हार है लेकिन सुभाष कोई देश के दुश्मन नहीं हैं !"
गाँधी जी के लगातार विरोध से, कांग्रेस की कार्य कारिणी के अनेक सदस्यों को इस्तीफा देना पड़ता अत: कांग्रेस की एकता बनाए रखने के लिए सुभाष ने स्वयं ही अपना त्यागपत्र दे दिया और कोई राजनीतिक विकल्प न होते हुए, सुभाष जी ने "आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक" की स्थापना की ! यह एक वामपंथी पार्टी है जो अभी भी भारत में कार्यरत है !
इसके साथ ही सुभाष ने १९३८ में ही 'नेशनल प्लानिंग कमेटी' के विचार को अपनी सहमति प्रदान की !
सुभाष की यह विचारधारा थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न हुई इंलैंड की अस्थिरता का भारत को लाभ उठाना चाहिए न कि प्रतीक्षा करनी चाहिए कि विश्वयुद्ध के पश्चात ब्रिटेन भारत को स्वतंत्रता दे देगा ! गाँधी, नेहरू और कांग्रेस की लीडरशिप यही आशा कर रही थी ! सुभाष, इटली के प्रसिद्ध क्रांतिकारी गैरीबाल्डी के विचारों से प्रभावित थे !
इंग्लैंड में रहते हुए उन्हों ने लेबर पार्टी के नेता 'लार्ड हैलीफैक्स' से भी मुलाक़ात की और भारत की स्वतंत्रता को लेकर विचार विमर्श भी किया था ! उन्हों ने जॉर्ज लाशरी, क्लेमेंट एटली, आर्थर ग्रीनवुड, हेराल्ड लास्की, इवोर जेनिंग्स, गिबर्ट मूर आदि से भी मुलाक़ात की थी ! तुर्की के श्री कमाल अतातुर्क से अंग्रेजों ने मिलने की इजाज़त नहीं दी थी !
सुभाष ने इंग्लैंड में रहते हुए लेबर पार्टी तथा अन्य स्वतत्र विचारधारा वाले नेताओं से भी विचार विमर्श किया था परन्तु डेमोक्रेट्स ने उनसे मुलाक़ात नहीं की थी, (क्योंकि भारत, इंग्लैंड का एक औपनिवेशिक राज्य था ) लेकिन इन्हीं डेमोक्रेट्स ने १९३० में भारतीय उपनिवेशवाद का विरोध किया था !
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि इंग्लैंड में लेबर पार्टी के शासन काल (१९४५-५१) में ही, लार्ड क्लेमेंट एटली के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई थी !
३ सितम्बर १९३९ को दुर्भाग्यवश इंग्लैंड और जर्मनी के बीच युद्घ छिड गया, सुभाष ने लार्ड लिनलिथगो के राजनीतिक बहिष्कार का समर्थन किया था ! लार्ड लिनलिथगो ने बिना कांग्रेस की अनुमति प्राप्त किए ही, भारत की ओर से युद्घ में भागीदारी घोषित कर दी थी ! गाँधी को इस विषय पर समझाने के सभी प्रयास विफल हो जाने पर सुभाष ने कलकत्ता में अनेक स्थानों पर विशाल जनसभाएं आयोजित कीं और लार्ड लिनलिथगो का विरोध किया !
गाँधी, कांग्रेस कार्यकारिणी कि इस कार्रवाई से खुश नहीं थे ! उनका मानना था कि कांग्रेस का सहयोग बिना शर्त होना चाहिए था यानी कि कांग्रेस को ब्रिटेन से उसके युद्घ-उद्देश्यों के विषय में भी नहीं पूछना चाहिए था १ इस विषय में गाँधी, वायसराय से मिले ! वायसराय ने उन्हें उत्तर दिया कि इस परिस्थिति में ब्रिटिश सरकार कभी भी अपने उद्देश्य स्पष्ट नहीं करेगी ! ब्रिटेन ने कभी भी लोकतंत्र के लिए लड़ने का दावा नहीं किया है ! सुभाष बोस के अनुसार कांग्रेस की यह नीति, निष्क्रिय रहने की नीति थी ! क्या चर्चिल व चेम्बर्लेन को युद्घ के उद्देश्यों की जानकारी न थी ?
ब्रिटिश साम्राज्य को युद्घ में मदद देने के बारे में गाँधी के विचार, युद्घ की स्थिति के अनुसार बदलते रहे ! फिर १९४० में गाँधी ने 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' प्रारम्भ किया अर्थात व्यक्तिगत सत्याग्रह ! परन्तु धीरे - धीरे यह यह आन्दोलन ठंडा पड़ गया, और अंत में दिसम्बर १९४० में इसे वापिस ले लिया गया !
२३ से ३० दिसम्बर १९४१ के दौरान कांग्रेस कार्यकारिणी ने बारदौली में बैठक की, इस बैठक में अहिंसा के मुद्दे पर दो विचार उठ रहे थे ! नेहरू, मौलान आजाद और राजगोपालाचारी का मानना था कि अहिंसा की नीति को त्याग कर युद्घ में ब्रिटेन की मदद की जाए ताकि उससे कुछ रियायतें हासिल की जा सकें ! पटेल, राजेंद्र प्रसाद तथा कुछ अन्य अहिंसा की नीति को छोड़ने को तैयार नहीं थे यानी कि वे इंग्लैंड की मदद करने के खिलाफ थे ! गाँधी, शुरू में बिना शर्त इंग्लैंड की मदद करने को तैयार था, बाद में उसने भी इंग्लैंड की मदद करने से इनकार कर दिया !
सुभाष ने देश में घूम-घूम कर लोगों को बताना आरम्भ किया कि ब्रिटेन के खिलाफ संघर्ष करना, भारत तथा कांग्रेस के हित में होगा ! सुभाष ने व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर, गांधी जी से आन्दोलन छेड़ने का अनुरोध किया परन्तु गाँधी ने आन्दोलन छेड़ने से मना कर दिया ! उधर लाहौर अधिवेशन में मुहम्मद अली जिन्ना ने अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग कर दी !
गाँधी का कहना था कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिए ! सुभाष ने प्रतिरोध में कहा था कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम उसके गाल पर दो थप्पड़ मार दो !
इसी विचारधारा के होते हुए और विश्वयुद्ध में इंग्लैंड के खिलाफ होने का मन बना चुके सुभाष ने ३ जुलाई १९४० को कलकत्ता के 'होलेवेल स्मारक' को तोड़ने की घोषणा कर दी ! आवेश में आकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया !
अंत में, सुभाष को फिर से जेल में डाल दिया गया परन्तु सुभाष द्वारा की गई भूख हड़ताल (१ नवंबर १९४० से एक हफ्ते तक) से बौखला कर अंग्रेज सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया ! वे अपने पैतृक घर कलकत्ता आ गए ! अंग्रेजों ने उन्हें उनके घर में ही नज़रबंद कर दिया था ! अभी दो केस और बाकी थे परन्तु तब तक सुभाष यह समझ चुके थे कि जब तक युद्घ समाप्त नहीं हो जाता, न तो अंग्रेज़ उन्हें रिहा करेंगे और न ही उन्हें भारत से बाहर जाने देंगे ! इस नज़रबंदी से सुभाष को अंग्रेजों का द्रष्टिकोण समझने में बड़ी सहायता मिली ! सुभाष ने इस नज़रबंदी से निकल कर विदेश जाने की योजना बनाई अत: उन्होंने सभी से मिलना-जुलना बंद कर दिया और अपना एकांतवास घोषित कर दिया ! उनहोंने दाढ़ी बनवानी बंद कर दी ! धार्मिक ग्रन्थों को अपने पास रख कर अध्ययन आरम्भ कर दिया तथा साधू की तरह रहना प्रारम्भ कर दिया ! अपने कमरे में उन्होंने स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तस्वीरें लगा लीं ! उनके कमरे में कोई नहीं जा सकता था ! खाना भी एक खिड़की से ही दिया जाता था ! इस तरह नज़रबंदी में ही उनका अज्ञातवास आरम्भ हो गया !
दाढ़ी बढा लेने पर उन्होंने अपनी दाढ़ी मुस्लिम तरीके से नक़ल कर ली और पठान मौलवी का रूप धारण कर लिया ! जनवरी १९४१ में, उनके भाई शिशिर कुमार बोस उन्हें कार से गोमेह रेलवे स्टेशन ले गए जहां से वे पेशावर की और चल दिए, उन्हें पठानी भाषा का ज्ञान नहीं था, फिर भी वे सकुशल पेशावर जा पहुंचे !
पेशावर में वे फारवर्ड ब्लाक के कुछ प्रमुख सदस्यों श्री अकबर शाह, श्री मुहम्मद शाह, तथा श्री भगत राम तलवार से मिले ! वे श्री आबिद हसन के घर रुके ! २६ जनवरी १९४१ को सुभाष ने भगत राम तलवार के साथ काबुल की और प्रस्थान किया ! चूंकि सुभाष को पश्तो नहीं आती थी, जिसका लाभ उठाकर अंग्रेजों के जासूस उन्हें गिरफ्तार कर सकते थे ! अत: मियां अकबर की सलाह पर सुभाष ने गूंगे और बहरे पठान का रूप धारण कर लिया ! उन्हों ने अपनी दाढ़ी भी स्थानीय लोगों की तरह बढा ली थी ! उनका नया मुस्लिम नाम जियाउद्दीन रखा गया ! भगत राम तलवार उनका भतीजा बना तथा अपना नाम रखा -रहमत खान !
अंग्रेज जासूसों तथा अनेकों चेक पोस्टों से बचते-बचाते दोनों चाचा भतीजा काबुल जा पहुंचे ! काबुल में एक गुप्तचर इनके पीछे पड़ गया तब भगत राम तलवार ने उसे पैसे दिए , फिर भी वह न माना तो भगत राम जी ने अपनी कीमती घडी ही उसे दे दी ! उससे पीछा छूटने पर भगत राम अपने एक परिचित उत्तम चंद मल्होत्रा, जिनकी काबुल में, रेडियो रिपेयर तथा फोटोग्राफर की दुकान थी, के घर सुभाष को ले गए ! सुभाष को गिरफ्तारी का भय था अत; वे श्री उत्तम चंद मल्होत्रा के मेहमान बन कर रहे, जबकि अंग्रेजों के जासूस उन्हें कुत्तों की तरह ढूँढ रहे थे ! उस एक ही कमरे के मकान में सुभाष जी ने उत्तम चंद मल्होत्रा के साथ ४७ दिन काटे !
इस बीच फारवर्ड ब्लाक के मुस्लिम साथियों, मल्होत्रा जी तथा भगत राम जी के प्रयासों से, जर्मनी की एक जासूसी संस्था ABWHER के ज़रिए, जो अफगानिस्तान में सड़क निर्माण कर रही थी, सुभाष मास्को जा पहुंचे !
मास्को में सुभाष इस उम्मीद से गए थे कि रूसी सरकार ब्रिटेन से राजनीतिक विद्वेष के रहते, भारत से अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फँकने में उनकी मदद करेगी परन्तु उन्हें रूसी सरकार से कोई सहायता नहीं मिली ! आशानुरूप परिणाम न निकलता देखकर सुभाष जर्मन दूतावास जा पहुंचे और जर्मनी के राजदूत श्री काउंट वान डेट शलेनबर्ग से भेंट की ! इस मुलाक़ात का अत्यंत आशानुरूप परिणाम निकला !
एक कोरियर विमान द्वारा सुभाष को बर्लिन ले जाया गया ! मास्को से बर्लिन ले जाने के लिए एक नया पासपोर्ट, एक नए इतालवी नाम, "काउंट ओरलेंडो मोजेटो" के नाम से बनवाया गया और तब सुभाष इस नए नाम से रोम पहुंचे और फिर जर्मनी !
बर्लिन (जर्मनी) की राजधानी पहुँचने पर, जर्मनी के विदेश मंत्री, यूरिक फ्रेडरिक विल्हेम जोएचिन वान रिबेनट्राप' द्वारा भव्य स्वागत किया गया !(ये १९३८-१९४५ तक जर्मनी के विदेश मंत्री रहे)
जर्मनी में सुभाष ने ' स्पेशल ब्यूरो आफ इंडिया' की स्थापना की ! इसकी स्थापना जर्मनी के एक वकील ADAM VON TROTT ZU SOLZ के आधीन की गई ! यहाँ से जर्मनी द्वारा SPONSORED, AAZAD HIND RADIO का प्रसारण किया जाता था ! यह संस्था नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की अध्यक्षता में रेडियो प्रसारण कार्य करती थी ! इसकी स्थापना १९४२ में की गई थी !
जनरल रोमेल (Fox of desert
) और भारतीय स्वतंत्रता सैनिक बर्लिन (जेर्मनी) में ;नेता जी ने यहीं पर 'फ्री इंडिया सेंटर' की भी स्थापना की और लगभग ४५०० भारतीय सैनिक कैदियों (जो कि इससे पूर्व उत्तरी अफ्रीका में AXIS POWERS अर्थात धुरी शक्तियों द्वारा या अंग्रेजों के दुश्मन देशों द्वारा युद्घ बंदी बना लिए गए थे) को लेकर INDIACHE LEGION अर्थात एक भारतीय लडाकू दल गठित किया जो कि WHERMACHT की कमान के साथ सम्बन्धित कर दिए गए थे ! यह नाजी जर्मनी की सेना का १९३५-१९४५ तक का नाम था !
इस बीच सुभाष द्वारा देश वासीयों के नाम दिए गए एक रेडियो प्रसारण से कि, "देशवासियों मैं सुभाष चन्द्र बोस, आजाद हिंद रेडियो से आप सब का अभिनन्दन करता हूँ !"
इस सन्देश से और सुभाष के देश से फरार हो कर जर्मनी जा पहुँचने की घटना सुन कर सारा देश दंग रह गया ! आजाद हिंद रेडियो, जर्मनी से सुभाष के प्रसारण भारत और दक्षिण पूर्व में बहुत सुने जाते थे ! हिन्दुस्तानी जन-जन सुभाष का भक्त बन चूका था ! वे दो बार कांग्रेस के सभापति भी चुने जा चुके थे फिर भी अंग्रेजी सरकार की नज़रबंदी से फरार हो कर मास्को, इटली होते हुए सुभाष का जर्मनी जाना, उसे आम जनता की नज़रों में नायक (हीरो) का दर्जा प्रदान कर चुका था ! इससे अंग्रेजों की छवि धूमिल हुई थी ! गुप्तचर विभाग की असफलता स्पष्ट थी ! सुभाष का चेहरा जाना-पहचाना था ! २० वर्षों में वे ११ बार गिरफ्तार किए जा चुके थे ! भारत की तत्कालीन राजनीति और कांग्रेस कार्य समिति के प्रमुख सदस्यों में से एक थे ! फिर भी वे कलकत्ता से पेशावर, काबुल हो कर मास्को निकल गए और अंग्रेजों को सिर्फ हाथ मल कर रह जाना पडा ! इससे शर्मनाक घटना अंग्रेजों के लिए और क्या हो सकती थी ?
अपनी इसी बे-इज्जती को बर्दाश्त न कर पाने के कारण ही ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को सुभाष की हत्या करने का हुक्म दिया था !
सुभाष रेडियो से भारत की जनता को अपने संदेशों द्वारा क्रान्ति के लिए तैयार कर रहे थे ! उनके सन्देश का आरम्भ इन पंक्तियों से होता था:-
"गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की !
तख्ते लन्दन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की !!"
तथा सूचना या अन्य सन्देश के उपरांत निम्न पंक्तियों से समापन किया जाता था ;
"मज़ा आएगा जब, हम अपना राज देखेंगे !
कि- अपनी ही ज़मीं होगी, अपना आसमां होगा !
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले !
वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा !!"
अंत में निम्न नारों से समापन किया जाता था:-
"इन्कलाब जिंदाबाद"
"आजाद हिंद फौज-जिंदाबाद "
"विजय या मृत्यु-जीत या मौत"
१९४१ में जापान ने सिंगापुर पर अपना कब्ज़ा कर लिया था और वहाँ से ब्रिटिश शासन का अंत हो गया था ! यह समाचार पाते ही सुभाष ने जर्मनी से आजाद हिंद रेडियो के प्रसारण से अपना जो सन्देश भारतवासियों को दिया, उसके प्रमुख अंश इस प्रकार हैं:-
"देशवासियों मैं सुभाष चन्द्र बोस, आजाद हिंद रेडियो से आप सबका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ ! मैं आज विश्व के ऐतिहासिक चौराहे पर खडा हो कर अपने देश के सभी नागरिकों से अनुरोध करता हूँ वे ब्रिटिश हकूमत के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखें ! यदि आप सभी अपना संघर्ष जारी रखेंगे तो हमारी प्यारी भारत माँ अंग्रेजों से मुक्त हो जाएँगी ! आप सभी उसी भारत माता के प्रेमी हैं जिसका प्रेमी मैं भी हूँ !
किसी अंग्रेज़ के सामने हमारे देशवासियों को सिर झुकाने की जरूरत नहीं; यदि किसी का सिर झुकेगा तो फिरंगी हमारे देश के स्वाभिमान पर हसेंगे, इसलिए आप उन्हें हसने का मौका मत देना ! हम कल भी सिर उठा कर जी रहे थे और मरते दम तक सिर उठा कर जिएंगे ! साथियो ! मैं विदेश में रह कर अपने संघर्ष को दिन-प्रतिदिन ऊंचाई प्राप्त करा रहा हूँ ! इसलिए मेरा आप सभी से अनुरोध है कि सभी हिन्दुस्तानी, एकता के सूत्र में बंधने की कृपा करें !
सुभाष जी की ह्त्या करने का आदेश १९४१ में ही दे दिया गया था, जब अंग्रेजों को इस बात की भनक लगी कि सुभाष ने उनके विरोधी देशों (AXIS POWERS) से मदद मांगी है तो अंग्रेजों ने अपने जासूसों को सुभाष की हत्या करने का आदेश दे दिया ! यह आदेश दिया गया कि, "इससे पूर्व कि सुभाष की जर्मनी में हिटलर से मुलाक़ात हो, उनकी ह्त्या कर दी जाए !"
यह भी सुभाष की वाक-पटुता और चातुर्य ही तो था कि हिटलर ने सुभाष की बात मानकर उन ४५०० कैदियों को स्वतंत्र कर दिया जो उत्तरी अफ्रीका में मित्र-राष्ट्रों की ओर से जर्मनी के खिलाफ लड़ते हुए गिरफ्तार कर लिए गए थे ! हिटलर ने न सिर्फ कैदियों को रिहा ही किया अपितु पूरी इज्ज़त भी दी ! हिटलर तो पहले से ही भारतियों की वीरता व् कुशलता का कायल था ! इससे पूर्व में १९३६ के बर्लिन ओलिम्पिक में, उसने हाकी के महान खिलाडी मेजर ध्यानचंद को हाकी में स्वर्ण पदक जीतने पर बधाई दी थी और यह जानकर तो वह और भी प्रसन्न हो उठा था कि ध्यानचंद जी सेना में थे ! उसने ध्यानचंद जी से जब उनका रैंक (पद) पूछा तो उत्तर सुनकर वह सन्न रह गया कि वे सेना में सिपाही थे ! वह निराश हो गया और उसने जवाब दिया कि यदि वे जर्मनी की सेना में होते तो कम से कम मेजर तो अवश्य ही बना दिए जाते !
इसी हिटलर ने यहूदियों की बेपनाह हत्याएं कराई थीं परन्तु सुभाष के व्यक्तित्व ने उसे भारत और भारतीयों का दीवाना बना दिया था !
इन्हीं कैदियों को जर्मनी की क़ैद से रिहा करवा कर INDIAN LEGION या आजाद हिंद फौज का गठन किया गया था ! यह केवल सुभाष के प्रयत्नों से ही संभव हुआ था ! इन सभी भारतीय कैदियों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गई थी ! वे कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र थे ! वे जर्मनी में चाहे जहां जा सकते थे, कोई बाधा न थी ! उनको जर्मनी में बसने की अनुमति भी दे दी गई थी ! वे वहां की लड़कियों से शादी करके घर बसा सकते थे ! उन्हें हर प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गई थी और उन्हें जर्मनी के नागरिकों, सैनिकों की भांति पूर्ण मान-सम्मान प्राप्त था !
भारतीय स्वतंत्रता सैनिक जर्मनी में सुभाष एवं हिटलर के प्रति विश्वास की शपथ लेते हुए ;
इस भारतीय सैनिक दल को बाद में WAFEN SS में शामिल कर लिया गया था ! इस संगठन या दल में शामिल सभी सदस्यों को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि, "शपथ: मैं इश्वर की शपथ लेता हूँ कि मैं जर्मनी राज्य, (RACE & STATE) जाति व देश के नेता एडोल्फ हिटलर के प्रति वफादार रहूंगा जो कि भारत के लिए युद्घ करने में जर्मनी के सेनापति हैं और जिसके नेता सुभाष चन्द्र बोस हैं !"
यह शपथ प्रमाणित करती है कि भारतीय सैन्य दल, जर्मनी सेना के आधीन होगा और कि भारत के सर्वमान्य नेता (OVERALL LEADER) सुभाष चन्द्रबोस हैं !
सुभाष तो जर्मनी के सहयोग और रूसी सरकार की सहमति से, आजाद हिंद सेना के नेतृत्व में भारत पर अफगानिस्तान की ओर से आक्रमण करने के विचार पर भी सहमत थे ! यहाँ एक शंका उठनी स्वाभाविक है यदि जर्मनी युद्घ में विजयी हो जाता तो क्या वह भारत को आसानी से छोड़ कर चला जाता ?
सुभाष ने हिटलर से सहायता पाने से पहले इन सब बातों पर विचार कर लिया था, उन्होंने हिटलर को भी यह आश्वासन दिया था की धुरीय शक्तियाँ भारत को आजाद करवा कर, चाहें तो अपना खर्च वसूल कर सकती हैं ! भारत इस ऋण को अदा कर देगा !
अत: यह आशंका निर्मूल थी, जर्मनी और धुरीय शक्तियों से केवल सहायता की ही अपेक्षा एवं प्रार्थना की गई थी !
दिसम्बर १९४२ में, सुभाष के घर एक बच्ची ने जन्म लिया जिसका नाम रखा गया था- अनीता बोस !
सुभाष की योजना थी की जर्मनी सेना के सहयोग से, रूस की तरफ से, अफगानिस्तान होते हुए भारत पर आक्रमण किया जाए, और भारत को मुक्त कराया जाए, परन्तु शायद इतनी कम सेना और रूस से मदद न मिलने के कारण यह योजना त्याग दी गई थी !
इस योजना को त्यागने का एक कारण और भी था, आजाद हिंद रेडियो जर्मनी से, सुभाष के प्रसारण, भारत और दक्षिण-पूर्व में बहुत सुने जाते थे ! सुभाष की प्रसिद्धि इन देशों तक जा पहुंची थी ! जन-जन सुभाष का भक्त बन चुका था !
सुभाष की प्रसिद्धि भारत और उससे आगे थाईलैंड, बर्मा, मलाया, सिंगापूर, कम्बोडिया, वियतनाम, ताईवान होती हुई जापान तक जा पहुंची थी ! जापान में प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस (यह वही रास बिहार बोस हैं जो लार्ड हार्डिंग पर १९११ में चांदनी चौक, दिल्ली में बम फेंकने के आरोपी थे, बाद में वे जापान चले गए औए फिर एक जापानी लड़की से शादी करके वहीँ बस गए थे!), ने जापान सरकार के सहयोग से एक भारतीय कैप्टेन सरदार मन मोहन सिंह जी (ब्रिटिश भारतीय सैनिक अफसर परन्तु स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) की अध्यक्षता में INDIAN NATIONAL ARMY का गठन किया था !
१५ फ़रवरी १९४२ को सिंगापुर की ब्रिटिश सेना ने जापान के समक्ष समर्पण कर दिया और सिंगापुर, जापान के कब्जे में आ गया सिंगापुर से लगभग ५५,००० भारतीय सैनिक (कुल बंदी सैनिकों की संख्या ९०००० से ऊपर) बंदी बनाए गए थे ! इन्हीं युद्घ बंदियों को रास बिहार बोस के प्रयत्नों से आजाद करवा कर कैप्टेन मन मोहन सिंह जी को सौंप दिया गया था ! इनमें से लगभग १२,००० कैदियों ने आई एन ए की सदस्यता ग्रहण कर ली थी और भारत देश की आज़ादी के लिए स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे ! कैप्टेन मन मोहन सिंह जी इस सेना के जन्मदाता एवं कमांडर थे ! उनके द्वारा गठित इस फौज का कार्य एवं उद्देश्य जापानी फौज के साथ, ब्रिटिश सेना के विरुद्ध कंधे से कंधा मिला कर लड़ना था !
बैंकाक में भारत का एक प्रतिनिधि सम्मलेन हुआ जिसमें सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था ! श्री रास बिहारी बोस इस सम्मलेन के सभापति थे ! सम्मलेन में ही इंडियन इंडीपेनडेंस लीग का गठन किया गया था !
कैप्टेन सरदार मन मोहन सिंह जी बैंकाक के इस सम्मलेन में भी उपस्थित थे, थे तो वे मात्र एक ब्रिटिश भारतीय सेना के एक कैप्टेन, परन्तु चूंकि वे राष्टीय स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़े थे ! वे सिंगापुर में रास बिहार बोस के संपर्क में थे और आरजी हकूमते हिंद {INDIAN
जापानी बहुत चालाक थे ! उनहोंने INA की कुल क्षमता २०,००० से ऊपर न करने का हुक्म दिया था जबकि INA के गठन के समय उनके पास केवल १२,००० के लगभग सैनिक थे ! इससे जापानियों को दोहरा फायदा था !
१)- जापानी चाहते थे कि युद्घ की अग्रिम पंक्ति में INA के भारतीय सैनिकों को रखा जाए और उनका मुकाबला भी ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों के साथ हो जिसका वे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं प्रभाव तथा लाभ, सभी लेना चाहते थे !
२)- जब मोर्चों पर गोलीबारी हो तो एक भारतीय, दूसरे भारतीय को मारता ! दोनों तरफ से मरने वाले भारतीय ही होते तथा हानि भी भारतीयों की ही होती ! दोनों तरफ से होने वाली गोलीबारी में हर नुक्सान भारतीय ही झेलते, आजाद हिंद फौज का तो केवल प्रोपेगेंडा (प्रचार) ही होता !
INA के भारतीय सैनिकों की जीत या हार से, दोनों अवस्थाओं से जापानी सेना को ही फायदा था ! मृत्यु दर तथा जख्मियों की गिनती दोनों भारतीयों की ही होती, कैप्टेन मन मोहन सिंह जी, अपने सैनिक अनुभव और योग्यता से जापानियों की इस चाल को समझ गए और उन्होंने जापानियों के हाथ का खिलौना बनने से इनकार कर दिया ! वे अधिक से अधिक भारतीयों को INA की सेना में भर्ती करना चाहते थे और स्वतंत्र रूप से ब्रिटिश भारतीय सेना से युद्घ करना चाहते थे !
इस से प्रेरित होकर उन्होंने भारत पर आक्रमण करने से इन्कार कर दिया और जापान से इस आक्रमण के लिए २,००,००० सैनिकों की मांग की जिसे जापान सरकार ने मानने से मना कर दिया ! इस तरह से INA और जापान सरकार के बीच मतभेद उभर कर सामने आए ! इन मतभेदों के कारण ही INA को दिसम्बर १९४२ में भंग कर दिया गया तथा कैप्टेन मन मोहम सिंह जी को तथा उनके INA के सभी १२,००० सैनिकों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया और फिर रेलवे लाइन बिछाने के काम पर DEATH VALLEY OF NEW GUINEA भेज दिया गया ! जिसे मौत की घाटी भी कहा जाता था !
कैप्टेन सरदार मन मोहन सिंह जी का INA का सुप्रीम कमांडर होना तथा जापान सरकार से हुए उनके मतभेदों के कारण तथा तजुर्बे-दोनों ही सुभाष के काम आए तथा सरदार मन मोहन सिंह जी अंत तक,INDIAN INDE-PENDENSE LEAGUE की कार्य कारिणी में मंत्री एवं सक्रिय सदस्य रहे !
कैप्टेन सरदार मन मोहन सिंह जी व हिन्दुस्तानी सैनिकों को बंदी बना लिए जाने के समाचार ने श्री रास बिहारी बोस व IIL की कार्यकारिणी के सदस्यों को झकझोर कर रख दिया ! कहाँ तो वे भारत की विदेशी सरकार को उखाड़ फेंकने का सपना देख रहे थे और इसके लिए प्रयत्नशील थे तथा कहाँ उन देशभक्त हिंद सैनिकों की गिरफ्तारी ? फिर भी वे कर्मठशील थे और उन्हों ने वक़्त की नज़ाक़त को देखते हुए, भारतीय सैनिकों की दुबारा रिहाई और भारत की आजादी की लड़ाई के लिए अपने प्रयत्न जारी रखे और INDIAN INDEPENDENSE LEAGUE की पुन: आवश्यकता एवं उसकी राजनीतिक व सैनिक अगुवाई के लिए श्री रास बिहारी बोस को, श्री सुभाष चन्द्र बोस एक उचित पात्र लगे !
जर्मनी में सुभाष की सफलता एवं प्रसिद्धि, जो समस्त दक्षिण-पूर्व देशों से होती हुई उनकी यशो-गाथा तो जापान तक जा पहुंची थी ! उनके रेडियो संदेशों ने इन दूरस्थ-देशों में बसे भारतीयों के मन में स्वाधीनता की लहर उत्पन्न कर दी थी, उनमें एक नया जोश भर दिया था-मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने का !
ऐसे में श्री रास बिहारी बोस ने जापान सरकार के सहयोग एवं सहमति से, जापान सरकार की ओर से ही INA का चार्ज सम्भालने का निमंत्रण, सुभाष को दिसम्बर १९४२ के अंत में या शायद जनवरी १९४३ में ही भेजा गया था !
बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख ! सुभाष के पास जर्मनी में केवल ४५०० भारतीय सैनिक थे परन्तू सिंगापुर में १२,०० तैयार सैनिक, इसके अतिरिक्त एक सम्भावना और भी थी कि सिंगापुर से पकडे गए सभी ५५,००० कैदियों को भी समझा कर और देश प्रेम की भावना जगाकर विदेशी सरकार के विरुद्ध युद्घ में भाग लेने और मातृभूमि को आजाद करवाने के लिए मनाया जा सकता था ! इसके साथ ही समस्त दक्षिण पूर्वी देशों में बसे प्रवासी भारतीयों की भी सहायता ली जा सकती थी !
इन उपरोक्त कारणों पर विचार करके सुभाष भी अपना मन सिंगापुर जाने के लिए बना चुके थे ! उधर जर्मनी में हिटलर ने सुभाष की बात मानकर भले ही भारतीय सैनिकों को रिहा कर दिया था और उन्हें सम्पूर्ण आज़ादी भी दे दी थी ! फिर भी हिटलर एक काइयां परन्तु महत्वाकांक्षी व्यक्ति था ! जब सुभाष ने हिटलर से पूछा था कि क्या वह युद्घ में सफलता के उपरांत भारत को आज़ादी दे देगा तो वह इस प्रश्न का जवाब टाल गया था !
इससे सुभाष के मन में शंका के बीज उत्पन्न हो गए थे और उधर रूस ने भी सुभाष को युद्घ में सहयोग देने से मना कर दिया था ! अत: अब सुभाष दुसरे उपाय ढूँढने में लगे थे कि दैवयोग से ही ऐसे समय में उन्हें जापान सरकार का ओर से जापान आने और INA की कमान संभालने का निमंत्रण प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने तुंरत स्वीकार कर लिया !
यह निमंत्रण, सुभाष को जापान सरकार द्वारा श्री रास बिहारी बोस के प्रयत्नों से मिला ! सन्देश में कहा गया था कि दक्षिण-पूर्व में लगभग २०,००० लडाकू सैनिक और स्वदेश के लिए कुर्बान होने वाले लाखों भारतीय नागरिक तथा तकरीबन ५५,००० भारतीय युद्घ बंदी हैं ! अत: वे दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के स्वतत्रता आन्दोलन को एक नई दिशा देने के लिए प्रबंध संभालें !
इस सन्देश को सुभाष ने तुंरत स्वीकार कर लिया और जापान जाने के सुअवसर की तलाश करने लगे !
यहाँ यह याद रखने की बात है कि सुभाष के घर में, वियना में दिसम्बर १९४२ में ही, एक नन्हीं बच्ची ने जन्म लिया था, जिसका नाम उन्होंने अनीता रखा था ! एक पत्र द्वारा इसकी सूचना उन्होंने अपने भाई शिशिर बोस को भी दे दी थी !
परन्तु आज़ादी के इस मतवाले राही को, नई जन्मी बच्ची की किलकारियां, या पत्नी का मोहपाश भी, कुछ भी नहीं बाँध सका उसे ! अपनी पत्नी तथा बेटी को छोड़कर वह, सुदूर-पूर्व की यात्रा पर, देश - प्रेमियों की सेना का गठन करने और ब्रिटिश राज से जूझने का सपना संजोए पनडुब्बी द्वारा ८ फ़रवरी १९४३ को अपनी यात्रा पर, नई मंजिल की तलाश में, अपने मिशन की प्राप्ति के लिए निकल पडा ! इसके बाद तो सारी उम्र उसे अपनी पत्नी तथा बच्ची अनीता की शक्ल देखना नसीब न हुआ ! सुभाष को फिर उनसे मिलने का मौका ही नहीं मिला !
जब सुभाष ने जापान के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तो उनहोंने जाने से पूर्व अपने कुछ विशेष कार्यों को अंजाम देना आरम्भ किया !
सर्वप्रथम तो उन्हींने अपनी पुत्री अनीता को अपनी ससुराल भेजा और अपनी पत्नी एमिली शेंकेल को यह समझा दिया कि यदि कोई उनके वहाँ से जाने के बाद उनके घर में उनसे मिलने आये तो वह कह दे कि सुभाष कहीं बाहर गए हैं और जल्दी ही लौट आयेंगे, तथा जब तक कि सुभाष जापान नहीं पहुँच जाते, तब तक वह (एमिली) बर्लिन में ही रूकी रहे !
दूसरी विशेष सावधानी उनहोंने यह बरती कि उनके कुछ भाषणों को टेप करके रख लिया गया जो सुभाष की गैरहाजिरी में भी बर्लिन से, आजाद हिंद रेडियो से प्रसारित होते रहे ! सभी को यही प्रतीत हुआ कि सुभाष जर्मनी में ही हैं !
तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह था कि ---४५०० भारतीय सैनिकों का, जिन्हें लेकर सुभाष ने INDIACHE LEGION लडाकू दल बनाया था उन सैनिकों को किसके सहारे छोड़कर जाते और उनके भविष्य का क्या निर्धारण हो ? इन सब का प्रबंध अति शीघ्र करना था !
मैंने सुभाष पर बहुत सी पुस्तकों का अध्ययन किया है परन्तु सभी लेखक इन सैनिकों पर चुप्पी साधे रहे ! कहीं-कहीं एक दो बातें लिख कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली परन्तु सुभाष जैसा व्यक्ति अपनी अगली सफलता की आशा में, अपने इन भारतीय भाइयों को, भारत देश से हजारों मील दूर, क्या इनको मंझधार में छोड़कर जा सकता था-कदापि नहीं !
और ऐसा किया भी नहीं गया ! सुभाष के जर्मनी में कुछ भारतीय सहयोगियों में से एक थे - नम्बियार ! पूरा नाम था श्री ए. सी. नम्बियार ! सन १९४२ में उनहोंने इस फौज की सदस्यता ग्रहण की ! श्री नम्बियार १८ वर्षों तक यूरोप में पत्रकार रहे और सुभाष की फौज में शामिल होकर भी वे फ्रांस में एकांतवास कर रहे थे !
लगभग उसी समय जर्मनी में एक और महत्वपूर्ण व्यक्ती उपस्थित था जो पूर्व में बम्बई कांग्रेस का सदस्य रह चुका था ! उसका नाम था गणमुले ! गणमुले ने भी सुभाष से प्रेरित होकर इस फौजी दल की सदस्यता ग्रहण की थी !
सुभाष के इस लडाकू दल में वहां जर्मनी व यूरोप के अन्य देशों के भारतीय भी शामिल थे जिनमें से अधिकाँश प्रथम विश्व युद्ध के उन भारतीय सैनिकों की संतान थे जो जर्मनी तथा अन्य देशों की लड़कियों से शादी करके वहीँ बस गए थे !
इन्हीं प्रवासी भारतीयों में से एक थे - आबिद हसन ! इनके पिता बनारस के मुस्लिम परिवार से थे और माता जर्मनी की ! ये सुभाष के निकटतम सक्रिय सदस्यों में से एक थे ! सुभाष के दल में शामिल होकर इन्होंने जर्मनी में ही ट्रेनिंग ली थी !
इस दल में सैनिक व गैर सैनिक कोई भी शामिल हो सकता था ! उसे उसकी योग्यता के अनुसार ही ट्रेनिंग दी जाती थी और उसी के अनुरूप ही कार्य भी दिया जाता था ! श्री गिरिजा कुमार मुखर्जी तथा श्री एम. आर. व्यास रेडियो प्रसारण का कार्य देखते थे !
श्री ए.सी. नम्बियार को सुभाष ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया हुआ था ! जर्मनी छोड़ कर जाते हुए इस दल का चार्ज या अधिकार सुभाष ने नम्बियार जी को ही दिया था ! श्री एस. के. लाल, इनके सहयोगी अधिकारी घोषित किए गए थे !
indiache legion के ४५०० सैनिकों के साथ, सुभाष के जर्मनी छोड़ने के पश्चात् जो बीती, वह अवर्णनीय है परन्तु यह एक यशो गाथा है उन अनजाने भारतीय वीर देशभक्त सैनिकों की, जो सुभाष के प्रति और देश के प्रति ली गई एक शपथ की निष्ठां पर कुर्बान हो गए ! सुभाष के जर्मनी छोड़ने के पश्चात, जर्मनी में रहे ४५०० भारतीयों ने सम्पूर्ण निष्ठां एवं कर्तव्य परायणता का परिचय दिया और पश्चिमी मोर्चों पर मित्र राष्ट्रों के खिलाफ, जर्मन सेना के साथ कंधे से कंधा मिला कर युद्ध में भाग लिया और अपने नेता सुभाष चन्द्र बोस के समक्ष ली गई शपथ का अक्षरश: पालन किया ! यह अपने आप में द्वितीय विश्व युद्ध के अत्यंत गुप्त रहस्यों (BEST TOP SECRETS KEPT) में से एक है कि किस तरह ये भारतीय सैनिक, जर्मन सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिला कर वीरता पूर्वक लडे ! इसकी अन्यत्र मिसाल मिलनी मुश्किल है !
आजाद हिंद फौज के नाम पर भारतीय जन मानस, दक्षिण-पूर्व में गठित सेना को ही जानते हैं परन्तु उन वीर सैनिकों को, जो उत्तरी अफ्रीका में मित्र राष्ट्रों की और से लड़ते हुए (भारतीय ब्रिटिश सेना के सैनिक) गिरफ्तार कर लिए गए थे और जिनकी संख्या लगभग ४५०० थी ! इन कैदियों को सुभाषचंद्र बोस ने ही आज़ादी दिलाई तथा पूर्ण सम्मान-जनक स्थान भी जर्मन के समाज में दिलवाया ! इन्हीं सैनिकों को लेकर ही INDIACHE LEGION या भारतीय लडाकू दल या आजाद हिंद फौज की जर्मनी में स्थापना की गई थी !
सुभाष तथा हिटलर के प्रति वफादारी तथा वतन की आज़ादी के ख्यालों से सराबोर, ये रण बाँकुरे वीर जवान, अपने रैंक (पद), अपनी पेंशन या अपनी तनख्वाह या अन्य सुख सुविधाओं की (सरकार की और से दी जाने वाली क्षति-पूर्ति आदि) को ठोकर मारकर वतन परस्ती के वशीभूत होकर, आज़ादी के आन्दोलन में कूद पड़े ! इनके कष्ट, इनकी व्यथा तो कलम के वर्णन से बाहर
यह अवर्णनीय व्यथा गढ़वाल के भूतपूर्व सैनिकों ने सुनाई थी जो कि स्वयं ही यह अवर्णनीय गाथा सुना कर गए हैं ! मैं इस पुस्तक में इस यशो गाथा का समावेश अवश्य ही करना चाहूंगा , यही मेरी इन वीर सैनिकों को अंतिम श्रद्धांजलि होगी ! किसी भी लेखक ने इन वीर सैनिकों की व्यथा एवं देश प्रेम के बारे में कुछ नहीं लिखा है ! इनकी कुर्बानियां, इनके कष्ट सुनकर ही रोगटे खड़े हो जाते हैं ! मैं यहाँ कोई भेदभाव या तुलना नहीं कर रहा हूँ, मेरे कहने का केवल यही अभिप्राय है कि आजाद हिन् फौज, जो दक्षिण पूर्व में, सिंगापुर में बनी थी, उसकी यशो-गाथा से तो सभी भारतीय परिचित हैं परन्तु जर्मनी में स्वयं सुभाष द्वारा बनाई गई INDIACHE LEGION (AZAD HIND FAUZ) के बारे हमारे देशवासियों को अधिक जानकारी नहीं है और मैं यही जानकारी पाठकों के साथ बांटना चाहता हूँ !
इनके साथ भारत की आजाद सरकार ने आज़ादी मिलने के पश्चात कोई सहयोग नहीं किया, इनकी कोई सहायता नहीं की गई ! INA (सिंगापुर) के सैनिकों की तरह ये आज़ादी के मतवाले भी (जो बच गए), खाली हाथ अपने घरों को लौटे ! स्वतंत्र भारत की सरकार और भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने तो आज़ादी मिलने से पहले ही इनके भविष्य का फैसला कर दिया था ! नेहरू ने, लार्ड माउन्टबेटन की उस शर्त को मान लिया था कि, "आजाद हिंद फौज के सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं किया जाएगा !"
जबकि पाकिस्तान में जिन्ना ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था और उसने अपनी सेना में INA के इन सभी भूतपूर्व सैनिकों को भर्ती कर लिया था !
वाह रे इस देश का दुर्भाग्य ! वीरों को अपनों के हाथों ही अपमान और कष्ट सहने के लिए मजबूर होना पडा ! लानत है ऐसी सरकार पर !
क्या विडम्बना है कि नेता जी तो अपने भाषणों द्वारा इन सैनिकों को देश भक्ति के लिए प्रेरित करते हुए आश्वासन देते थे कि स्वतंत्र भारत की सेना में इन्हीं सैनिकों को ही मेजर, कर्नल तथा अन्य ओहदों से सम्मानित किया जाएगा और कहाँ इस देश की आजाद सरकार ने इन्हें घास भी नहीं डाली !
नेहरू की अवसरवादिता ने इन सैनिकों के सपनों को कुचल दिया ! इनकी वीरता के बदले इन्हें अपमानित किया गया ! इनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया ! INA के लगभग २५,००० सैनिकों ने आत्म समर्पण किया था !
ये वो देश भक्त सैनिक थे जो वतन पर जाँ-निसार करने को, सर्वस्व - न्योछावर करने को, देश को विदेशी दासता से मुक्त कराने के लिए जान हथेली पर रख, परिवार की चिंता छोड़, आज़ादी की बलिवेदी पर सुभाष के साथ;
"कदम-कदम बढाए जा - ख़ुशी के गीत गाए जा !!
ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा !!"
गुनगुनाते हुए अपनी जिंदगी न्योछावर करने चल दिए थे ! ये अलबेले सैनिक INA में किसी स्वार्थ के लिए या तनख्वाह के लिए भर्ती नहीं हुए थे ! आज के जवान तो कम तनख्वाह का रोना रोते हैं ! कुछ तो अधिक पैसे के लिए अपनी फौज की नौकरी भी छोड़ देते हैं ! आज के युवा सेना में जाने की बजाए प्राइवेट कम्पनियां /मल्टी-नेशनल कंपनियों में सुख-सुविधाएं एवं अधिक तनख्वाह की नौकरी ज्यादा पसंद करते हैं !
कितना अंतर है इस पीढी में और उस पीढी में ? वह पीढी, नौजवानों की उस टोली से सजी थी, जो देश प्रेम में पैसा तो क्या, सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थी ! ऐसी सेना कहाँ मिलेगी !
तो जो INA के सैनिक, अपनी नौकरियां छोड़कर, घरों से हजारों मील दूर वतन की आज़ादी के लिए लडे, जिनमें से कईयों ने शहीदी प्राप्त की तो कई किस्मत वाले बचकर लौट भी आए-उन्हें इस देश ने क्या दिया ? न शहीदों को, और न ही जिन्दा शहीदों को ? क्या हमने (भारतियों ने) उनके साथ विश्वासघात नहीं किया ? अपनी सुख सुविधा की खातिर हम देश वासियों ने उन वीर सैनिकों के साथ द्रोह नहीं किया ? क्या हमने उनकी कुर्बानियों को भुला नहीं दिया ?
INA और INDIACHE LEGION के सैनिकों की व्यथा गाथा, जो स्वयं उन सैनिकों ने कही- हम आगे लिखेंगे !
अंतत: सुभाष ने जापान जाने का निर्णय ले लिया और अपनी सहमति से जापान सरकार को भी अवगत करा दिया ! तत्पश्चात फ़रवरी १९४३ में ही कैप्टेन सरदार मन मोहन सिंह जी व उनके सभी सैनिक साथियों को जापान सरकार ने रिहा कर दिया और उन्हें वापिस सिगापुर ले आया गया ! सुभाष के पास जापान जाने के दो ही रास्ते थे - वायु मार्ग या समुद्री मार्ग ! वायुयान से यात्रा करने में बहुत खतरे थे ! ब्रिटेन शासित देशों से होकर वे जा नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने समुद्री मार्ग से यात्रा करने का निर्णय लिया और अपनी योजना के बारे में हिटलर से बात की और उससे (हिटलर से) उनकी जापान यात्रा का प्रबंध करने को कहा ! हिटलर बेहद काइयां और शातिर इंसान था ! सुभाष को उस पर भरोसा न था ! परन्तु आशा के विपरीत हिटलर मान
गया !
सुभाष ने अपने एक अत्यंत विश्वसनीय साथी आबिद हसन के साथ ८ फ़रवरी १९४३ को एक पनडुब्बी में सवार होकर जर्मनी से विदा ली ! हिटलर ने जापान से बात करके सुभाष को पनडुब्बी से जापान भेजने का निर्णय लिया परन्तु सुभाष तथा उसकी यात्रा के बदले जापान सरकार से सौदेबाजी की!
अंतत: यह सौदा दो टन सोने के बदले तय हुआ ! यह निश्चित किया गया कि जब सुभाष जर्मनी की पनडुब्बी से-जापानी पनडुब्बी में सवार होंगे तो लगे हाथ ही यह दो टन सोना भी, जापानी पनडुब्बी से जर्मन की पनडुब्बी में लाद दिया जाएगा ! ऐसा ही किया भी गया !
इस सौदे को मेरीन टेक्नोलोजी का नाम दिया गया जबकि दोनों ही देश जापान तथा जर्मनी, पनडुब्बियों से सुसज्जित थे ! दोनों के ही पास पनडुब्बीयाँ थीं ! फिर भी दोनों देशों की सरकारें इस भेद को गुप्त रखने के लिए एकमत हुईं ! मुझे तो और कोई कारण नज़र नहीं आता जो कि इस धन को, इस सोने के रूप में उसी पनडुब्बी पर ही क्यों लादा गया जो सुभाष को लेकर आई थी और उतारा भी उसी पनडुब्बी से जो सुभाष को लेकर जाने वाली थी , अत: यह केवल आँखों में धूल झोंकने के लिए ही कहा गया था कि वह सोना, जर्मनी द्वारा जापान को मेरीन-टेक्नोलोजी ट्रांसफर करने के लिए दिया गया था ! सही मायने में तो यह प्रक्रिया सुभाष के बदले में, और इस हाथ दे - उस हाथ ले, के अर्न्तगत की गई थी !
"इधर सोना दो - उधर सुभाष लो"
संयुक्त सेनाओं के बमवर्षक विमानों से बचते हुए वे मेडागास्कर द्वीप समूह (हिंद महासागर) पहुंचे जहां से उन्हें जापान ले जाने के लिए जापानी पनडुब्बी मौजूद थी ! अब सोना जर्मनी पनडुब्बी में चढाया जा चुका था और सुभाष ने जर्मन पनडुब्बी के कैप्टेन का धन्यवाद किया और उनसे विदा ली ! यह जर्मन पनडुब्बी जर्मनी में KIEL (कील) बंदरगाह से चली थी और इसके कैप्टेन का नाम था - WERNER MUSENBERG तथा पनडुब्बी का नाम था -U-180.
अब सुभाष व आबिद हसन दोनों, दूसरी पनडुब्बी में सवार हुए जो जापानी सरकार ने सुभाष को लिवाने के लिए टोक्यो से भेजी थी ! इस पनडुब्बी के कैप्टेन का नाम था -MASAAO TARAOKE (मसाओ तराओके), तथा जापनी पनडुब्बी का नाम था- I-29.
इन दोनों पनडुब्बियों ने , जर्मन पनडुब्बी से सुभाष तथा आबिद हसन और जापानी पनडुब्बी से २ टन सोना व दो जापानी तकनीशियनों की अदला -बदली हुई ! यह घटना २६ अप्रैल १९४३ की है !
इस सोने को कागजों में ट्रांसफर आफ मेरीन टेक्नोलॉजी का नाम दिया गया था और वे दोनों टेक्नीशियन भी दुनिया को यही दिखाने के लिए इसी मिशन पर थे ! सच्चाई तो यह थी कि जापान सरकार ने, सुभाष को जर्मनी से जापान लाने की कीमत, इस सोने के रूप में जर्मंबी को अदा की थी !
यह द्वितीय विश्वयुद्ध की अकेली ऐसी अद्भुत घटना थी जिसमें दो सिविलियनों की, विश्व के दो प्रमुख देशों की पनडुब्बियों में अदला बदली हुई थी ! (वैसे अब सुभाष सिविलियन न थे क्योंकि वे INDIACHE LEGION के, जर्मनी के सेनापति भी थे जिसके अंतर्गत ४५०० ट्रेंड लडाकू सैनिक थे ) ६ मई १९४३ को, जापानी पनडुब्बी ने, अपने इन महत्वपूर्ण यात्रियों को सुमात्रा द्वीप समूह के उत्तर में एक अनजान द्वीप पर उतार दिया ! पहले जापान सरकार की योजना थी कि इन्हें पेनांग छोडा जाएगा परन्तु दुश्मन और उसके बमवर्षक विमानों की गतिविधियों से बचने के लिए ऐसा किया गया !
भारत की आज़ादी के सपने को यथार्थ में बदलने की इच्छा लिए यह आज़ादी का परवाना, जिसे भरोसा था स्वयं पर, और अपने देश वासियों पर और था अटूट विश्वास उस परम पिता परमात्मा पर ! तीन महीने की पनडुब्बी यात्रा समाप्त कर ११ मई १९४३ को सुमात्रा द्वीप समूह से वायुयान द्वारा टोक्यो, जापान पहुंचे !
यहाँ रेडियो टोक्यो से सुभाष ने देश वासियों को कई बार संबोधित किया ! अपने प्रसारण में देश वासियों को, भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए, आज़ादी के इस संग्राम में कूदने को प्रेरित और प्रोत्साहित किया !
उधर INA जो DEATH VALLEY OF NEW GUINEA से वापिस सिंगापुर आ गई थी, को पुन: संगठित किया गया और १५ फ़रवरी १९४३ को ही यह सेना लेफ्टिनेंट कर्नल लोगानाथन के नेतृत्व में आ गई थी ! लेफ्टिनेंट कर्नल भोंसले को INDIA INDEPENDENSE LEAGUE के नेतृत्व में, INA का इंचार्ज बना दिया गया था !
मुख्य प्रबंधन इस प्रकार था :--
१)- लेफ्टिनेंट कर्नल भोंसले = कमांडिंग इन चीफ,
२)- लेफ्टिनेंट कर्नल शाहनवाज़ खान = चीफ आफ जनरल स्टाफ,
३)- मेजर पी. के. सहगल = मिलिट्री सेक्रेटरी,
४)- मेजर हबीबुर्रहमान = कमांडेंट आफ आफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल,
५)- लेफ्टिनेंट कर्नल ए.सी.चटर्जी = हेड आफ एनलाईटमेंट एंड कल्चर !
बाद में इसका चार्ज मेजर ए. डी. जहांगीर को सौंप दिया गया था !
सुभाष चन्द्र बोस २ जुलाई १९४३ को टोक्यो से सिंगापुर पहुंचे और फ़ौरन बाद ही ४ जुलाई को कैथे बिल्डिंग, सिंगापुर में संपन्न हुए एक समारोह में IIL (INDIAN INDEPENDENSE LEAGUE) और INA (INDIAN NATIONAL ARMY) की कमान संभाल ली !
इस समारोह में नेताजी को जो फूल मालाएं भारत तथा दक्षिण पूर्व के प्रवासी भारतीयों ने चढाई थीं ! उनसे पूरा एक ट्रक भर गया था ! नेताजी ने इन फूल मालाओं की नीलामी की घोषणा की और कहा कि इस नीलामी से एकत्र पैसा INA की जरूरतों को पूरा करने और देश की स्वतंत्रता के लिए काम आएगा ! सिंगापुर के एक मुस्लिम व्यापारी ने उस समय इस नीलामी के लिए एक करोड़ रुपया दिया था !
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